06 April, 2025 (Sunday)

Behmai Case: कहानी उस Bandit Queen की जिसने तय किया बीहड़ से संसद तक का सफर, 11 साल तक काटा कारावास

एक बार फिर उस महिला की कहानी चर्चा में आई है जिसने अपनी माता की जमीन काे कब्जामुक्त कराने का ठाना तो था, लेकिन एक दिन एेसा आया जब उसे देश ने बैंडिट क्वीन के नाम से जाना। हम बात कर रहे कानपुर देहात के बेहमई गांव की रहने वाली दस्यु फूलन देवी की। जिसने अपने जीवन काल में जेल में ही 11 साल की सजा काटी और उसके बाद समाजवादी पार्टी से सांसद का टिकट लेकर चुनाव लड़ा। बेहमई केस की इस कड़ी में हम आपको बताएंगे कि आखिर वे क्या कारण थे जिन्होंने एक 10 वर्ष की बच्ची को पहले अपराध और फिर उसके बाद राजनीति में कदम रखने को विवश कर दिया।

अपने माता-पिता के हिस्से को कब्जामुक्त कराने का लिया था प्रण 

फूलन देवी का जन्म उत्तर प्रदेश के जालौन जिला स्थित घूरा कापुरवा में 10 अगस्त 1963 को हुआ था। यहां वह अपनी मां मूला देवी, पिता देवीदीन और तीन भाई-बहनों के साथ रहती थी। कहानी कुछ यूं है कि परिवार के पास मात्र एक एकड़ जमीन थी। जिस पर उसके चाचा मैयादीन मल्लाह ने उस वक्त कब्जा कर लिया था जब फूलन मात्र 10 साल की थी। माता-पिता को बातचीत करते देख जब उसे इस बात का पता चला तो उससे अपने माता-पिता का दुख देखा नहीं गया। तभी उसने अपने चाचा से जमीन को कब्जामुक्त कराने का दृढ़ निश्चय कर लिया था। बाल्यावस्था में लिया गया यह प्रण उसे अपराध के रास्ते पर कदर ले जाएगा कि एक दिन उसे समाज में ‘बैंडिट क्वीन’ के नाम से जाना जाएगा, यह बात फूलन ने शायद स्वप्न में भी नहीं सोची होगी।

बालिका-वधू बनने के बाद चाचा ने भिजवा दिया था जेल

मात्र 10 वर्ष की बेटी का क्रोध और चाचा के प्रति रोष देखकर फूलन के पिता से नहीं रहा गया। सजास्वरूप उन्होंने उसका विवाह पुत्तीलाल मल्‍लाह से करा दिया जो फूलन से उम्र में 30 साल बड़ा था। शादी के कुछ समय बाद पति की प्रताड़ना और शारीरिक शोषण से क्षुब्ध होकर वह मायके भाग आई। तब उसके चाचा मैयादीन ने फूलन पर चोरी का आरोप लगाकर जेल भेज दिया। इसके बाद उसे तीन दिन तक जेल में ही गुजर-बसर करना पड़ा। जब वह जेल से बाहर आई तो घर वालों ने गौना कर उसे वापस ससुराल भेज दिया था।

…जब पहली बार हुआ डाकुओं से सामना

दोबारा ससुराल पहुंची फूलन को वहां फिर उसी अत्याचार का सामना करना पड़ा जिसका सामना उसे पहले करना पड़ा था। अंतर सिर्फ इतना था कि इस बार अत्याचार सारी सीमाएं लांघ चुका था। जिसके बाद फूलन ने घर से भाग जाने की योजना बनाई और उसमें सफल भी हुई। शायद, उस समय उसकी किस्मत खराब थी जो अत्याचारी चाचा और दुराचारी पति के बाद बीहड़ में उसका सामना हुआ डाकू बाबू गुज्जर से। जिनका भयावह रूप फूलन को विचलित कर रहा था। जब उसने फूलन के साथ दुष्कर्म की कोशिश की तो उसकी गिरोह के ही डाकू विक्रम मल्लाह ने विरोध किया और बाबू की हत्या कर दी।

खुद तैयार की गैंग और कहलाई ‘बैंडिट क्वीन’

विक्रम को बाबू गुज्जर की हत्या करते देख उसके अंदर एक बार आत्मविश्वास बढ़ गया। वहीं,  उसने खुद का गिरोह बनाने के अलावा उन सभी लोगों से प्रतिशोध लेने का संकल्प लिया जिन्होंने फूलन को खून के आंसू रुलाने पर विवश कर दिया था। फूलन के आक्रोश का पहला शिकार बना उसका 40 वर्षीय पति जिसने दुराचार की सारी हदें पार की दी थीं। पति के गांव पर अपनी गैंग के साथ फूलन ने न सिर्फ हमला किया अपितु पति को गांव के बाहर लाकर चाकू मार-मारकर लहूलुहान कर दिया था। वहीं, बाबू गुज्जर की हत्या से ठाकुरों का गिरोह आग बबूला था। श्रीराम ठाकुर व लाला ठाकुर फूलन से बदला लेने की आग में जल रहे थे। एक दिन फूलन को उसके गिरोह के साथ पाकर ठाकुरों के गिरोह ने विक्रम मल्लाह की हत्या कर दी। इसके बाद वे फूलन को अगवा कर ले गए और उन्होंने उसका शोषण किया। कहते हैं कि इसी बात का बदला लेने को बेहमई में श्रीराम को खोजते फूलन गिरोह पहुंचा था और उसके भाग निकलने पर गांव के 20 लोगों की हत्या कर दी।

इस तरह हुई राजनीति में एंट्री 

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकार के अलावा दूसरे डकैत गिरोहों ने फूलन को पकड़ने की बहुत सी नाकाम कोशिशें कीं। तत्‍कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने 1983 में समझौता किया कि उसे फांसी नहीं दी जाएगी। तब फूलन आत्मसमर्पण के लिए राजी हो गई। फूलन देवी ने 12 फरवरी 1983 को अपने साथी डकैतों संग मध्यप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह, भिंड़ के एसपी आरके चतुर्वेदी के समक्ष 10 हजार लोगों की भीड़ के बीच आत्मसमर्पण कर दिया था। 11 वर्ष तक वह जेल में रही और वर्ष 1993 में मुलायम सिंह सरकार ने सारे आरोप वापस ले लिए। साथ ही  अगले ही वर्ष वह जेल से छूटकर बाहर आ गई। खूंखार प्रवृत्ति को त्याग जीवन की नई पारी की शुरुआत फूलन ने उम्मेद सिंह से विवाह रचाकर की। इसने वर्ष 1996 में मिर्जापुर से सपा के टिकट पर सांसद बनीं और दिल्ली में रहने लगीं। वर्ष 1998 में हारीं और बहुमत के आधार पर अगले ही साल जीत दर्ज की। 25 जुलाई 2001 को दिल्ली में ही घर के गेट पर शेरसिंह राणा ने गोली मारकर फूलन देवी की हत्या कर दी थी।

 

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *