10 March, 2026 (Tuesday)

हाईकोर्ट ने कहा- भारत में भी बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने के उपायों पर करें विचार

चैन्नई,(ईएमएस)। मद्रास हाईकोर्ट ने बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा और इंटरनेट पर अश्लील सामग्री की आसानी से उपलब्धता को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है। एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि वह ऑस्ट्रेलिया की तर्ज पर 16 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने से जुड़े कानून की संभावनाओं पर गंभीरता से विचार करे। न्यायमूर्ति जी. जयचंद्रन और न्यायमूर्ति के. के. रामकृष्णन की पीठ ने माना कि वर्तमान डिजिटल युग में बच्चे बेहद संवेदनशील और असुरक्षित स्थिति में हैं, जिन्हें इंटरनेट के खतरों से बचाना अनिवार्य है।
यह मामला वर्ष 2018 में मदुरै निवासी एस. विजयकुमार द्वारा दायर एक जनहित याचिका से जुड़ा है। याचिकाकर्ता ने मांग की थी कि इंटरनेट सेवा प्रदाताओं (आईएसपी) को पैरेंटल कंट्रोल या पैरेंटल विंडो जैसी सेवाएं अनिवार्य रूप से उपलब्ध कराने के निर्देश दिए जाएं, ताकि बच्चों को पोर्नोग्राफिक और आपत्तिजनक सामग्री तक पहुंचने से रोका जा सके। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने ऑस्ट्रेलिया के उस हालिया कानून का उदाहरण दिया, जिसमें 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग को प्रतिबंधित कर दिया गया है। अदालत ने इस तर्क से सहमति जताते हुए कहा कि भारत को भी इस दिशा में ठोस विधायी कदम उठाने की आवश्यकता हो सकती है।
अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि संबंधित प्राधिकरणों और बाल अधिकार संरक्षण आयोगों द्वारा पेश किए गए हलफनामे यह विश्वास दिलाने में विफल रहे हैं कि वे अपनी वैधानिक जिम्मेदारियों का पूरी तरह निर्वहन कर रहे हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि केवल कुछ वेबसाइटों को ब्लॉक कर देना ही पर्याप्त नहीं है, क्योंकि बाल यौन शोषण और अश्लील सामग्री ऑनलाइन जगत में अलग-अलग रूपों में मौजूद रहती है। इस पर प्रभावी नियंत्रण तभी संभव है जब यूजर-स्तर पर पैरेंटल कंट्रोल ऐप्स उपलब्ध हों और अभिभावकों को इसके प्रति जागरूक किया जाए। अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि स्कूलों में चलाए जा रहे वर्तमान जागरूकता कार्यक्रम नाकाफी हैं। पीठ ने केंद्र और राज्य स्तर के बाल अधिकार संरक्षण आयोगों को निर्देश दिया कि वे समाज के विभिन्न वर्गों में बाल अधिकारों और ऑनलाइन सुरक्षा उपायों को लेकर एक ठोस कार्ययोजना तैयार करें। अदालत ने अंत में टिप्पणी की कि हालांकि किसी सामग्री तक पहुंचना व्यक्ति का चुनाव हो सकता है, लेकिन बच्चों के मामले में समाज और सरकार की जिम्मेदारी कहीं अधिक बढ़ जाती है। इसी के साथ अदालत ने उम्मीद जताई कि भविष्य में इस दिशा में सख्त कानून और व्यापक जागरूकता अभियान चलाए जाएंगे।

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed