05 June, 2026 (Friday)

AAP के 7 सांसदों पर लागू होगा दल-बदल कानून? जानें विशेषज्ञों की राय

आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसदों को लेकर दल-बदल कानून पर नई बहस छिड़ गई है। चर्चा इस बात की है कि राघव चड्ढा के नेतृत्व में सात सांसदों के भारतीय जनता पार्टी में शामिल होने पर यह काूनन लागू होगा या नहीं।
नई दिल्ली: राघव चड्ढा की अगुवाई में आम आदमी पार्टी के सात सांसदों के बीजेपी में शामिल होने के बाद एक बार फिर दल बदल का मुद्दा चर्चा का विषय बन गया है। सियासी हलचल के बीच दल-बदल कानून को लेकर बड़ी कानूनी बहस छिड़ गई है।
कानूनी विशेषज्ञों के मुताबिक दसवीं अनुसूची राजनीतिक दलबदल को रोकने में तब नाकाम रहती है, जब दलबदल विलय का रूप ले लेता है। आम आदमी पार्टी (AAP) के सात राज्यसभा सांसदों का BJP में शामिल होना दलबदल विरोधी कानून का उल्लंघन नहीं माना जाएगा, क्योंकि यह कानून किसी भी विधायी दल के दो-तिहाई सदस्यों को अलग होकर किसी दूसरे दल में विलय करने की अनुमति देता है।
संविधान की 10 वीं अनुसूची में क्या है?
विशेषज्ञों के मुताबिक संविधान की 10 वीं अनुसूची में विलय की स्थिति में छूट दी गई है। यदि किसी सदन में किसी पार्टी के दो-तिहाई सदस्य अलग होकर किसी अन्य दल में विलय का फैसला करते हैं, तो उन पर अयोग्यता लागू नहीं होती।

वरिष्ठ अधिवक्ताओं मुकुल रोहतगी, नीरज किशन कौल और मनिंदर सिंह ने कहा कि दसवीं अनुसूची की धारा 4(2) में यह प्रावधान है कि अयोग्यता की सज़ा तब लागू नहीं होगी, जब सदन में किसी विधायी दल के दो-तिहाई सदस्य उस दल से अलग होने का फ़ैसला कर लें, जिसके टिकट पर वे चुनाव जीते थे, और किसी दूसरे दल में विलय कर लें।

एएम सिंघवी का नजरिया
हालांकि, सीनियर एडवोकेट एएम सिंघवी ने इस पर अलग नजरिया रखा। उन्होंने कहा कि सिर्फ विधायिका दल (Legislature Party) का विलय काफी नहीं है, बल्कि मूल राजनीतिक दल का विलय भी जरूरी होता है। सुप्रीम कोर्ट भी यह स्पष्ट कर चुका है कि विधायिका दल और राजनीतिक दल अलग-अलग इकाइयां हैं। हालाकि, उन्होंने कहा कि इससे भी ज़्यादा अहम बात यह है कि ऐसे विवादों का फ़ैसला करने वाला व्यक्ति सदन का स्पीकर होता है, जिसे अपना पद सत्ताधारी दल से मिलता है; इस वजह से दलबदल विरोधी क़ानून के प्रावधानों के तहत ऐसे सांसदों/विधायकों को अयोग्य ठहराना मुश्किल हो जाता है।

AAP के राज्यसभा में कुल 10 सांसद हैं। ऐसे में 7 सांसदों का अलग होना दो-तिहाई संख्या को पूरा करता है, जो इस मामले को कानूनी रूप से अहम बना देता है। सिंघवी ने आगे कहा, “पिछले एक दशक से मैं कई बार कह चुका हूं कि दसवीं अनुसूची संविधान का बेकार (sterile) हिस्सा है। इसे पूरी तरह हटा देना चाहिए और इसके स्थान पर सिर्फ दो लाइनें रखनी चाहिए: कोई भी सांसद/विधायक जिस पार्टी के टिकट पर चुना गया था, अगर उससे दलबदल करता है तो वह सदन की सदस्यता खो देगा और उसे दोबारा चुनाव लड़ना होगा।

नीरज किशन कौल ने क्या कहा?
नीरज किशन कौल ने कहा, “अगर विधायी दल के दो-तिहाई सदस्य यह स्वीकार करते हैं कि पार्टी का विलय हो गया है, तो विलय माना जाएगा और यह अयोग्यता से बचने का वैध बचाव होगा।” उन्होंने शिव सेना मामले का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने दसवीं अनुसूची की धारा 4(2) को अयोग्यता की कार्यवाही में वैध बचाव माना था।

मुकुल रोहतगी की क्या राय है?
मुकुल रोहतगी और मनींदर सिंह ने कहा कि विधायी दल सदन से जुड़ा होता है। “अगर राज्यसभा में किसी पार्टी के कुल सदस्यों में से दो-तिहाई सदस्य किसी दूसरी पार्टी में विलय का फैसला करते हैं, तो इसे वैध विलय माना जाएगा और एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत उन्हें अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा।”

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