चार पैरों का ये जांबाज सिपाही………..सूंघने की क्षमता से कई बार सुरक्षाबलों को बचाया
नक्सल प्रभावित इलाके में छिपे आईईडी को सुंघकर बेदम किया
नई दिल्ली,(ईएमएस)। जब वह पहली बार खाकी वर्दी वालों के बीच आया था, तब माह तीन महीने का एक मासूम पिल्ला था। न उस सरहदों की समझ थी, न बारूद की बू और न ही मौत का एहसास। लेकिन आज वही ‘रेमो’ (परिवर्तित नाम) भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) का एक ऐसा जांबाज सिपाही है, जिसके आगे नक्सलियों के लगाए आईईडी और विस्फोटक भी बेदम दिखाते हैं। रेमो की कहानी उन सैकड़ों ‘कॉम्बैट डॉग्स’ की बहादुरी की मिसाल है, जो खेल-खेल में मौत को मात देना सीख लेते हैं।
रेमो की पहली तैनाती छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित इलाके में हुई थी। जहां जमीन के नीचे छिपे आईईडी सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ा खतरा होते हैं। रेमो के हैंडलर, जो आईटीबीपी में तैनात जवान हैं, बताते हैं कि रेमो ने अपनी तेज सूंघने की क्षमता से कई बार जवानों का रास्ता सुरक्षित बनाया। कई मौकों पर रेमो ने समय रहते विस्फोटकों की पहचान कर संभावित बड़े हादसों को टाल दिया।
एक कुशल विस्फोटक खोजी कुत्ता बनने में रेमो को करीब नौ माह की कड़ी ट्रेनिंग से गुजरना पड़ा। उसके हैंडलर बताते हैं कि जब रेमो को ट्रेनिंग सेंटर लाया गया, तब वह बेहद चंचल और शरारती था। कभी-कभी वह बात नहीं मानता था, जिससे गुस्सा भी आता, लेकिन ट्रेनिंग में सख्ती से ज्यादा प्यार, धैर्य और इनाम का सहारा लिया जाता है। पसंदीदा खाना और खिलौने उसकी सबसे बड़ी प्रेरणा बने। हैंडलर के मुताबिक, कई बार 24 घंटे साथ रहकर अभ्यास किया गया और धीरे-धीरे रेमो उनका सबसे भरोसेमंद साथी बन गया।
सेना और अर्धसैनिक बलों में शामिल किए जाने वाले कुत्तों की उम्र तीन महीने से अधिक नहीं होनी चाहिए। इसके बाद उन्हें 9 से 18 महीनों तक तीन चरणों में प्रशिक्षण मिलता है। पहले चरण में ‘बेसिक कमांड’ सिखाए जाते हैं, जिसमें बैठना, उठना, चलना और निर्देशों का पालन करना शामिल है। इसी दौरान कुत्ते और हैंडलर के बीच मजबूत तालमेल बनता है।
दूसरे चरण में कुत्ते का ‘बिहेवियर टेस्ट’ होता है, जिसके आधार पर तय किया जाता है कि वह विस्फोटक पहचानने, नशीले पदार्थों की खोज, ट्रैकिंग या गार्ड ड्यूटी के लिए उपयुक्त है या नहीं। तीसरे और सबसे अहम चरण में विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है, जहां कुत्तों को जमीन सूंघकर विशिष्ट गंध पहचानना सिखाया जाता है।
रेमो की ट्रेनिंग का सबसे कठिन हिस्सा था साइलेंट इंडिकेशन’। अगर कुत्ता विस्फोटक देखकर भौंक दे, तब उससे संवेदनशील बम फट सकते हैं। इसलिए रेमो को सिखाया गया कि गंध मिलते ही वह चुपचाप तय दूरी पर बैठ जाए। उसका बैठना ही हैंडलर के लिए खतरे का संकेत होता है। हैंडलर गर्व से कहते हैं, “कुत्ता इस दुनिया का सबसे वफादार प्राणी है। एक बार आदेश मिल जाए, तब वह हर हाल में अपना काम पूरा करता है। यही वजह है कि कॉम्बैट डॉग्स लगभग 99 प्रतिशत मामलों में सफल रहते हैं।”
