05 June, 2026 (Friday)

Premanand Maharaj: क्या मुक्ति या मोक्ष के लिए नाम जपना स्वार्थ है? प्रेमानंद महाराज ने बताया

Premanand Maharaj: हाल ही एक महिला भक्त ने प्रेमानंद महाराज से पूछा कि क्या नाम जप करना स्वार्थ नहीं है? मुक्ति या मोक्ष के लिए नाम जपना भी तो स्वार्थ ही है? महिला भक्त के इस प्रश्न का बड़ा ही सुंदर जवाब प्रेमानंद महाराज ने दिया.
Premanand Maharaj: क्या मुक्ति या मोक्ष के लिए नाम जपना स्वार्थ है? प्रेमानंद महाराज ने बताया
Premanand Maharaj: प्रेमानंद महाराज एक प्रसिद्ध संत और अध्यात्मिक गुरू हैं. वो अपने सरल, मधुर और गहरे प्रवचनों के लिए जाने जाते हैं. प्रेमानंद महाराज लोगों को ईश्वर की भक्ति का मार्ग दिखाते हैं. उनके उपदेशों से अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त होता है. साथ ही जीवन की हर परेशानी का हल मिलता है. हाल ही एक महिला भक्त ने प्रेमानंद महाराज से पूछा कि क्या नाम जप करना स्वार्थ नहीं है? मुक्ति या मोक्ष के लिए नाम जपना भी तो स्वार्थ ही है?

महिला भक्त के इस प्रश्न का बड़ा ही सुंदर जवाब प्रेमानंद महाराज ने दिया. प्रेमानंद महाराज ने कहा कि नाम जपने से आत्मा ईश्वर से जुड़ती है. ये आत्मा का ईश्वर से मिलन का एक सरल और पावन तरीका है. नाम जपना कोई स्वार्थ नहीं है. नाम जपने से मन को शांति प्राप्त होती है. जीवन में संतुलन आता है. व्यक्ति अदंर से निर्मल बनता है. मोक्ष की कामना भी स्वार्थ नहीं है, क्योंकि मोक्ष की कामना आत्मिक उन्नति के लिए होती है. भौतीक लाभ के लिए नहीं.

भक्ति स्वार्थ में शुरू की जाती है- प्रेमानंद महाराज
प्रेमानंद महाराज ने आगे कहा कि व्यक्ति स्वार्थ में अमृत पिएगा तो अमर हो जाएगा. भगवान का नाम जपना भी अमृत है. व्यक्ति स्वार्थ में ही सही, लेकिन नाम जप करेगा तो उसका भला हो जाएगा. उन्होंने बताया कि भक्ति स्वार्थ में शुरू की जाती है. बाद में जब धीरे-धीरे मन पवित्र और शुद्ध होता है, तो भक्ति निस्वार्थ हो जाती है.

भगवान को पाने के बाद कोई इच्छा नहीं रहती
प्रेमानंद महाराज ने आगे बताया कि माया पर हम भी विजय हासिल करना चाहते थे, लेकिन हमारी इस इच्छा ने हमें परमार्थ के रास्ते पर आगे बढ़ाया. इसी तरह हर व्यक्ति की कोई न कोई कामना होती है, जिसकी वजह से वो आगे बढ़ता है. हमारी सबसे बड़ी इच्छा भगवान को प्राप्त करना है. अगर इच्छा ही न हो तो आगे कैसे बढ़ेंगे? उन्होंने बताया कि भगवान को पाने के बाद व्यक्ति के मन में कोई इच्छा नहीं रह जाती.

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