10 March, 2026 (Tuesday)

क्या प्रदूषण बन रहा है साइलेंट किलर!

नई दिल्ली (ईएमएस)। आमतौर पर लोग मानते हैं कि खराब हवा से गला खराब होना, खांसी, जुकाम, आंखों में जलन और सिरदर्द जैसी समस्याएं बढ़ती हैं, क्योंकि ये असर तुरंत महसूस होते हैं। लेकिन दिल का दौरा पड़ना लोगों को अक्सर अचानक और बिना चेतावनी के लगता है, इसलिए प्रदूषण को इसकी वजह मानना आसान नहीं होता। हालांकि कई विशेषज्ञ और शोध इस ओर इशारा कर रहे हैं कि शहरों में बढ़ता वायु प्रदूषण अब दिल के लिए भी गंभीर खतरा बन चुका है। असल में प्रदूषण सिर्फ दिल्ली की सर्दियों में दिखने वाले स्मॉग तक सीमित नहीं है। यह जरूर है कि पराली का धुआं, पटाखे और ठंडी हवा मिलकर जब स्मॉग बनाते हैं, तब हवा की गंदगी साफ नजर आती है और लोग परेशान हो जाते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि शहरों में सालभर हवा की गुणवत्ता खराब रहती है।
गाड़ियां, फैक्ट्रियां और निर्माण कार्य लगातार ऐसे महीन कण छोड़ते रहते हैं, जो दिखाई नहीं देते, लेकिन शरीर पर गहरा असर डालते हैं। इन्हीं कणों को पीएम2.5 कहा जाता है, जो इतने सूक्ष्म होते हैं कि आंखों से नजर ही नहीं आते। पीएम2.5 का खतरा इसी बारीकी में छिपा है। जब हम सांस लेते हैं, तो बड़े कण नाक और गले में ही फंस जाते हैं, जिससे खांसी या जलन होती है। लेकिन पीएम2.5 के कण इतने छोटे होते हैं कि वे सीधे फेफड़ों के सबसे अंदरूनी हिस्से तक पहुंच जाते हैं। वहां से वे खून में मिल जाते हैं, क्योंकि फेफड़ों की दीवारें बेहद पतली होती हैं। एक बार खून में पहुंचने के बाद ये कण पूरे शरीर में फैल जाते हैं और दिल तथा धमनियों पर असर डालते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक ये कण खून की नलियों में सूजन पैदा करते हैं, जिससे वे संकरी हो जाती हैं। नतीजा यह होता है कि दिल को खून पंप करने के लिए ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है और ब्लड प्रेशर बढ़ने लगता है। इसके साथ ही पीएम2.5 खून को गाढ़ा बना सकता है, जिससे थक्के बनने की आशंका बढ़ जाती है। अगर ऐसा थक्का दिल की किसी नस में फंस जाए, तो हार्ट अटैक की स्थिति बन सकती है। लंबे समय तक प्रदूषित हवा में रहने से धमनियों में धीरे-धीरे प्लाक जमने लगता है, जो भविष्य में गंभीर हृदय रोगों की वजह बन सकता है। विशेषज्ञ मानते हैं कि हार्ट अटैक के मामलों में कोविड, वैक्सीन, खान-पान और जीवनशैली जैसे कई कारणों पर चर्चा हुई है, लेकिन वायु प्रदूषण को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

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