06 June, 2026 (Saturday)

यूएन में भारत ने किया ईरान का खुला समर्थन, देखते रह गए पश्चिमी देश

न्यूयॉर्क,(ईएमएस)। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के 39वें विशेष सत्र में जहां तमाम पश्चिमी देश ईरान के खिलाफ लाए गए का प्रस्ताव का समर्थन कर रहे थे वहीं भारत ने पश्चिमी देशों की परवाह किए बगैर खुले तौर पर ईरान का समर्थन किया। ईरान में मानवाधिकारों की स्थिति को लेकर पश्चिमी देशों द्वारा लाए गए निंदा प्रस्ताव पर भारत ने खुलकर तेहरान (ईरान) का साथ दिया। भारत ने न केवल इस प्रस्ताव का विरोध किया, बल्कि नो (विपक्ष में) वोट डालकर पश्चिमी देशों, विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय गुट को चौंका दिया है।
यह मतदान प्रस्ताव संख्या ए/एचआरसी/एस-39/एल.1 पर हुआ। इस प्रस्ताव का उद्देश्य इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान में मानवाधिकारों की बिगड़ती स्थिति की निंदा करना था। विशेष रूप से, यह प्रस्ताव 28 दिसंबर 2025 से ईरान में शुरू हुए राष्ट्रव्यापी विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में लाया गया था। पश्चिमी देश चाहते थे कि यूएन ईरान के खिलाफ सख्त रुख अपनाए, लेकिन ग्लोबल साउथ के कई अहम देशों ने इसे पश्चिमी एजेंडा करार देते हुए खारिज कर दिया।
एक दुर्लभ अवसर था जब किसी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत, चीन और पाकिस्तान एक ही सुर में (ईरान के पक्ष में) वोट करते नजर आए। अमेरिका (पर्दे के पीछे से) और यूरोपीय देशों ने इस प्रस्ताव को पास कराने के लिए पूरा जोर लगाया था। कुल 25 देशों ने पक्ष में वोट किया था। आमतौर पर, भारत मानवाधिकारों से जुड़े देश-विशेष प्रस्तावों पर तटस्थ रहने की नीति अपनाता है। लेकिन इस बार नोट वोट करना भारत की विदेश नीति में एक बड़े बदलाव का संकेत है। भारत ने स्पष्ट कर दिया है कि वह पश्चिमी दबाव में नहीं आएगा। ईरान के साथ भारत के गहरे ऐतिहासिक और ऊर्जा संबंध हैं, साथ ही चाबहार पोर्ट जैसी रणनीतिक परियोजनाएं भी महत्वपूर्ण हैं।
भारत ने इंडोनेशिया, वियतनाम और इराक जैसे एशियाई देशों के साथ मिलकर यह संदेश दिया है कि मानवाधिकारों के नाम पर किसी देश के आंतरिक मामलों में दखलअंदाजी स्वीकार नहीं की जाएगी। विश्लेषकों का मानना है कि भारत का यह कदम पश्चिमी देशों के दोहरे मापदंड के खिलाफ एक कड़ा संदेश है। हालांकि 25 वोटों के बहुमत से यह प्रस्ताव पास हो गया, लेकिन भारत, चीन और इंडोनेशिया जैसे बड़े एशियाई देशों का विरोध (नोट) करना इस प्रस्ताव की नैतिक जीत को कमजोर करता है। पश्चिमी देश भारत के इस कदम को ईरान के साथ अपनी बढ़ती रणनीतिक साझेदारी के रूप में देख रहे हैं।

 

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