06 June, 2026 (Saturday)

हिंदी दिवस के अवसर पर बुद्ध पीजी कालेज कुशीनगर में आयोजित हुआ संगोष्ठी

कुशीनगर। हिंदी क्षेत्र होने के बावजूद यहां के नब्बे प्रतिशत लोग एक पृष्ठ शुद्ध लिख नहीं सकते। यह स्थिति शर्मनाक है। भाषा के प्रति यह उपेक्षा हमें निरन्तर कमजोर करेगी। हिंदी भाषी लोग हिंदी के साथ विभाषा जैसा व्यवहार कर रहे हैं। हिंदी के प्रति गर्व के भाव को बनाए और हिन्दी के अस्तित्व को बचाए।
यह विचार डाँ0 जगदीश प्रसाद त्रिपाठी ने व्यक्त की। वह हिंदी दिवस के अवसर पर बुद्ध स्नातकोत्तर महाविद्यालय, कुशीनगर के हिंदी विभाग द्वारा आयोजित संगोष्ठी को बतौर  मुख्य अतिथि संबोधित कर रहे थे।
उन्होंने कहा कि  राजनीतिक कारणों से पचास वर्ष पूर्व हिंदी के साथ जो व्यवहार कभी तमिल, तेलगु और कन्नड़ भाषियों ने हिंदी के साथ किया था उससे बुरा व्यवहार आज हम कर रहे हैं। हिंदी के महत्व पर अहिन्दीभाषी विद्वानों के योगदान को रेखांकित करने के साथ उन्होंने भारतेंदु के “निज भाषा उन्नति अहै, निज उन्नति के मूल” की स्मृति करते हुए इन्होंने माखनलाल चतुर्वेदी, सुभद्राकुमारी चौहान, रामधारी सिंह दिनकर आदि के योगदानों की चर्चा की।
 गोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ अमृतांशु कुमार शुक्ल ने कहा कि हिंदी को यदि हम सामयिक जरूरतों के अनुरूप नहीं बना पाए तो यह भी कालातीत हो जाएगी। हिंदी से जुड़ने वाले लाभों पर चर्चा करना जरूरी है। न्यायालय के आदेश आज तक हिंदी में नहीं मिल पाते थे। अब इस ओर बढ़ा जा रहा है। भाषाओं को हिंदी वैज्ञानिक तकनीकी की भाषा नहीं रही है आज आईआईटी वाराणसी जैसे संस्थान इसका निर्माण कर रहे हैं। हमारी अभिजात्यता से अंग्रेजी जुड़ गई है। रूस से जब फ्रेंच को छोड़कर अपनी रसियन पर जोर देना शुरू किया तभी विकसित बन पाया। आगे बढ़ने के लिए भाषा के इस महत्व पर ध्यान देने की जरूरत है।
गोष्ठी को सम्बोधित करते हुए भूगोल विभाग के डॉ कौस्तुभ नारायण मिश्र ने कहा कि कान्वेंट में बच्चों को शिक्षा दिलाना आज फैशन बन गया है। बच्चों का हिंदी से दुराव वहीं से शुरू हो जाता है। वैश्विक स्तर पर संस्कृत और हिंदी की महत्ता तो बढ़ी है लेकिन हमारे यहां यह हीनताबोध से जुड़ गई है। यह बहुत ही खेद का विषय है। स्वागत भाषण करते हुए हिंदी के विभागाध्यक्ष डॉ राजेश कुमार सिंह ने कहा कि भारत सरकार हिंदी दिवस मनाती है किंतु उसने हिंदी भाषा की देवनागरी लिपि के अंकों के प्रयोग को प्रतिबंधित कर दिया है। कोई यदि देवनागरी में गाड़ी का नम्बर लिख दिया तो उसका चलान कट जाता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। सरकार को इस पर विचार करना चाहिए। गोष्ठी का संचालन करते हुए हिंदी के उपाचार्य डॉ गौरव तिवारी ने कहा कि हिंदी की उपेक्षा का कारण हम सब हैं हम अपने बच्चों को अपनी मातृभाषा से काटने की गलती कर रहे हैं। व्यक्ति को उसकी मातृभाषा से काटने का मतलब उसकी संस्कृति से भी काटना है। यदि हमारे बच्चे अपनी भाषा से कटते जाएंगे तो वे इस महान भारतीय संस्कृति के भी अच्छे वाहक नहीं बन सकते। धन्यवाद ज्ञापन श्री दीपक ने किया। कार्यक्रम में डॉ बृजेश सिंह, डॉ रामभूषण मिश्र, डॉ राघवेंद्र मिश्र, डॉ हरिशंकर पांडेय, गुआकटा उपाध्यक्ष डॉ सीमा त्रिपाठी, डॉ उर्मिला यादव, डॉ कुमुद त्रिपाठी, डॉ रेखा तिवारी, डॉ रीना मालवीय, डॉ उमाशंकर त्रिपाठी, डॉ इंद्रजीत मिश्र, डॉ ज्ञानप्रकाश मङ्गलम, डॉ निगम मौर्य, डॉ सत्येन्द्र गौतम, डॉ, सौरभ द्विवेदी, डॉ सुबोध गौतमडॉ राकेश सिंह, डॉ रितेश सिंह, डॉ राकेश चतुर्वेदीकमलेश, घनश्याम, नीलू, मनीषा, बृजेन्द्र, सपना आदि की उपस्थिति रही।
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