चुनावी रणनीति बनाने के बादशाह हैं अमित शाह, आडवाणी और वाजपेयी के लिए निभाई थी अहम जिम्मेदारी
देश के गृह मंत्री अमित शाह का राजनीतिक सफर बड़ा उतार-चढ़ाव वाला रहा है। इसके बाद भी उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी, बल्कि हर चुनौती का डटकर मुकाबला भी किया और उससे सफलतापूर्वक पार भी किया है। उनके राजनीतिक सफर की बात करें तो इस लंबे सफर की शुरुआत छात्र नेता के तौर पर हुई थी। छात्र नेता से केंद्र सरकार के सबसे अहम पद तक पहुंचने की कहानी को सभी के लिए जानना भी बेहद जरूरी है।
देश के गृह मंत्री अमित शाह का राजनीतिक सफर बड़ा उतार-चढ़ाव वाला रहा है। इसके बाद भी उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी, बल्कि हर चुनौती का डटकर मुकाबला भी किया और उससे सफलतापूर्वक पार भी किया है। उनके राजनीतिक सफर की बात करें तो इस लंबे सफर की शुरुआत छात्र नेता के तौर पर हुई थी। छात्र नेता से केंद्र सरकार के सबसे अहम पद तक पहुंचने की कहानी को सभी के लिए जानना भी बेहद जरूरी है।
अमित शाह पीएम नरेंद्र मोदी के काफी करीबी माने जाते हैं। इनके साथ को चार दशक से भी अधिक समय हो गया है। दरअसल इन दोनों की मुलाकात 1982 में कालेज के दिनों में ही हुई थी। इसके एक वर्ष बाद शाह अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े और यहां से उन्होंने छात्र राजनीति की राह भी पकड़ी। बता दें कि मुंबई में जन्मे अमित शाह ने बॉयोकेमिस्ट्री में बीएससी की है। उनके पिता व्यापारी थे। अपने पिता की तरह उन्होंने भी शुरुआत में पिता के साथ व्यापार में ही उनका हाथ बंटाया था। अमित शाह पेशे से स्टाक ब्रोकर थे। बाद में वो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। 1987 में अमित शाह भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुए थे। इसी वर्ष उन्हें भारतीय जनता युवा मोर्चा का सदस्य बनाया गया।
1991 में उन्हें अपने राजनीतिक करियर का बड़ा टास्क पूरा करने को मिला। उस वक्त लाल कृष्ण आडवाणी गांधी नगर से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे। तब अमित शाह पर उनके प्रचार और प्रसार का जिम्मा सौंपा गया था। इसको उन्होंने बखूबी पूरा किया। इस सफलता के बाद 1996 में उन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी के चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी को बखूबी निभाया। इसके बाद 1997 में उन्होंने गुजरात की सरखेज विधानसभा सीट से भाजपा के टिकट पर उप चुनाव जीता था। ये उनके राजनीतिक करियर का तीसरा अहम पड़ाव था।
यहां से वो चार बार (1997, 1998, 2002, 2007) विधायक चुने गए थे। 1999 में शाह अहमदाबाद डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव बैंक (एडीसीबी) के अध्यक्ष चुने गए और वर्ष 2009 में गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के उपाध्यक्ष बने। 2014 में नरेंद्र मोदी के गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन का अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद इसकी जिम्मेदारी भी अमित शाह ने ही संभाली थी। शाह 2003 से 2010 तक गुजरात सरकार की कैबिनेट में गृह राज्य मंत्री भी रहे। वर्ष 2012 में उन्होंने नारनपुरा से विधानसभा चुनाव जीता था।
शाह के राजनीतिक करियर में एक पड़ाव वो भी आया जब 2004 में हुए इशरत जहां समेत दो अन्य की फर्जी एंकाउंटर में हत्या को लेकर उनके ऊपर अंगुली उठी। हालांकि बाद में कोर्ट ने उन्हें इस मामले में बरी कर दिया था। ये उनके लिए एक बड़ी जीत थी। इसके बाद 2010 में उन्हें सोहराबुद्दीन शेख मुठभेड़ मामले में भी गिरफ्तारी का सामना करना पड़ा था। 12 जून 2013 को अमित शाह को भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश के प्रभारी के तौर पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी थी।
उस वक्त देश के सबसे बड़े सूबे में पार्टी के पास केवल दस सीट हुआ करती थीं। खुद को साबित करने के लिए अमित शाह ने यहां के लिए न सिर्फ एक कामयाब रणनीतिक बनाई बल्कि उसको सफलतापूर्वक अंजाम तक भी पहुंचाया। उनकी मेहनत की बदौलत मई 2014 को उत्तर प्रदेश से भाजपा को 71 सीट हासिल हुई थीं। भाजपा की प्रदेश में ये अब तक की सबसे बड़ी जीत थी। इस जीत के साथ अमित शाह का कद और बढ़ गया था। बता दें कि अमित शाह ने अपने राजनीतिक करियर में चुनाव की जो रणनीति बनाई वो कभी बेकार साबित नहीं हुई है।
