05 June, 2026 (Friday)

वंदे मातरम् पर चर्चा : “हिम्मत है तो…” प्रियंका गांधी का मोदी सरकार पर पलटवार, पढ़िए 10 बड़े वार

लोकसभा में वंदे मातरम् पर चर्चा की शुरुआत पीएम मोदी ने की थी. इसके बाद चर्चा में हिस्सा लेते हुए प्रियंका गांधी ने मोदी सरकार पर निशाना साधा.
राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’की रचना के 150 साल होने पर लोकसभा में चर्चा की गई. इस चर्चा की शुरुआत पीएम मोदी ने की थी. पीएम मोदी ने अपने भाषण में कांग्रेस और जवाहर लाल पर खूब हमला बोला था. जब कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा की बारी आई तो उन्होंने भी पीएम मोदी और भाजपा पर निशाना साधा. प्रियंका गांधी ने कहा कि वंदे मातरम् पर बंगाल चुनाव की वजह से बहस हो रही है. उन्होंने कहा कि यह सरकार मौजूदा मुद्दों से ध्यान भटकाना चाहती है. इसलिए ही यह वर्तमान और भविष्य की बात ना करते हुए हमेशा अतीत की बात करती है.

BJP पर प्रियंका गांधी ने ऐसे साधा निशाना
हम यह बहस आज दो वजहों से कर रहे हैं, पहला बंगाल का चुनाव आ रहा है. हमारे प्रधानमंत्री उसमें अपनी भूमिका निभाना चाहते हैं. इसके पीछे दूसरा मकसद है, जिन्होंने आजादी की लड़ाई लड़ी, जिन्होंने देश के लिए कुर्बानी दी, उन पर सरकार नए आरोप लादने का मौका चाहती है. देश का ध्यान ज्वलंत मुद्दों से भटकाना चाहती है. आपका मकसद है कि हम फिर से उसी अतीत में भंडराते रहें, उसी की ओर हम देखते रहें, जो हो चुका है, जो बीत चुका है. यह सरकार वर्तमान और भविष्य की ओर देखना ही नहीं चाहती है. वे इस काबिल ही नहीं रहे.
आज मोदी जी वह प्रधानमंत्री नहीं रहे, जो एक समय में थे. सच यह है कि ये दिखने लगा है. उनका आत्मविश्वास घटने लगा है. उनकी नीतियां देश को कमजोर कर रही हैं. मेरे सत्तापक्ष के साथी चुप इसलिए हैं क्योंकि अंदर-अंदर से वे भी इस बात से सहमत हैं. आज देश के लोग खुश नहीं हैं. परेशान हैं. तमाम समस्याओं से घिरे हुए हैं. उन समस्याओं का हल आप निकाल नहीं रहे हैं.
आपका शासन दमन का शासन है. इनकी राजनीति दिखावे की राजनीति है. इवेंट मैनेजमेंट की राजनीति है, चुनाव से चुनाव तक की राजनीति है, ध्यान भटकाने वाले मुद्दों की राजनीति है. वंदे मातरम् इस देश की उन्हीं उम्मीदों की गुहार है, जिन्हें आपका शासन हर रोज ठुकरा रहा है. आज भी सीमा पर कोई जवान दुश्मन के सामने होता है तो उसके सीने में वंदे मातरम् गूंजता है, आज भी जब हमारा खिलाड़ी इंटरनेशनल खेलों में जाता है तो उसके दिल की धड़कन में वंदे मातरम् होता है. आज भी इस देश के करोड़ों देशवासी जब अपने राष्ट्रीय ध्वज को देखते हैं तो उनकी जबान पर वंदे मातरम् होता है.
कांग्रेस के हर एक अधिवेशन में 1905 से लेकर आज तक सामूहिक तौर पर वंदे मातरम् गाया जाता है. आप बताइए कि क्या आपके अधिवेशन में गाया जाता है? देश की आत्मा के इस महामंत्र को विवादित करके, आप बहुत बड़ा पाप कर रहे हैं. इस पाप में कांग्रेस पार्टी शामिल नहीं होगी. यह राष्ट्र गीत हमेशा से हमें प्यारा है, हमेशा से हमारे लिए पवित्र रहा है, हमेशा रहेगा.
आज की बहस सिर्फ ध्यान भटकाने के लिए की जा रही है. क्योंकि यह सरकार वर्तमान की वसीयत को छिपाना चाह रही है. आज देश का युवा परेशान है, पेपर लीक हो रहे हैं, बेरोजगारी है, महंगाई इतनी बढ़ी गई है. इसकी चर्चा हम सदन में क्यों नहीं कर रहे. आरक्षण के साथ हो रहे खिलवाड़ की चर्चा हम क्यों नहीं कर रहे. महिलाओं की बात होती है तो बड़े-बड़ो ऐलान होते हैं, लेकिन उनकी हालात सुधारने के लिए ठोस कदम नहीं उठाए जाते.
हम यहां बैठकर छोटी-छोटी बातें करेंगे. हम अतीत की बातें करते हैं, बार-बार पीछे देखते हैं, लेकिन भविष्य और वर्मतान की बातें नहीं करते. हिम्मत है तो भविष्य की बात कीजिए, बात कीजिए कि पेपर लीक क्यों होते हैं, बेरोजगारी क्यों है?हम देश के लिए हैं, आप चुनाव के लिए हैं. हम जितने भी चुनाव हारें, यहां बैठे रहेंगे, आपसे लड़ते रहेंगे, आपकी विचारधारा से लड़ते रहेंगे. अपने इस देश, अपनी मिट्टी के लिए लड़ते रहेंगे, आप हमें रोक नहीं सकते.
आज जिस विषय पर हम चर्चा कर रहे हैं. वह केवल एक विषय नहीं है, भारत की आत्मा का एक हिस्सा है. हमारा राष्ट्रगीत का उस भावना का प्रतीक है, जिसमें गुलामी में सोए हुए भारत के लोगों को जगाया. जिसने उन्हें हिम्मत दी कि ब्रिटिश साम्राज्य के सामने खड़े होकर, सत्य और अहिंसा के नैतिक हथियारों के साथ सामना कर पाएं. आज यह चर्चा एक भावना के ऊपर है. और जब हम वंदे मातरम् का नाम लेते हैं तो वही भावना उजागर होती है. हमें उस पूरे इतिहास की याद आती है, जो स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास था. उसकी पीड़ा, उसका संघर्ष, उसका साहस, उसकी नैतिकता की याद दिलाता है, जिसके सामने ब्रिटिश साम्राजय झुक गया था.
हमारा राष्ट्र गान भी एक लंबी कविता का एक अंश ही है. इन दोनों के अंश चुनने में भूमिका रवींद्रनाथ टैगोर की थी. वंदे मातरम् के इस स्वरूप पर सवाल उठाना, जिसे संविधान सभा ने मंजूर किया, ना सिर्फ उन महापुरुषों का अपमान करना है, जिन्होंने अपने महान विवेक से यह फैसला किया. मगर एक संविधान विरोधी मंशा को भी उजागर करता है. क्या सत्तापक्ष के हमारे साथी इतने अहंकारी हो गए हैं कि वे खुद को महात्मा गांधी, राजेंद्र प्रसाद, रवींद्रनाथ टैगोर, भीमराव अंबेडकर, सरदार पटेल, सुभाष चंद्र बोस से बड़ा समझने लगे हैं. मोदी जी का अपने भाषण में यह कहना कि राष्ट्र गीत को एक विभाजनकारी सोच द्वारा काटा गया, उन सभी महापुरुषों का अपमान है. जिन्होंने अपना पूरा जीवन इस देश को दे दिया.
28 अक्तूबर 1937 में कांग्रेस की कार्यसमीति ने अपने प्रस्ताव में वंदे मातरम् के उन्हीं दो अंतरों को राष्ट्र गीत घोषित किया था. इस बैठक में महात्मा गांधी, सुभाष चंद्र बोस, जवाहर लाल नेहरू, आचार्य नरेंद्र देव, सरदार पटेल, गुरुदेव रवींद्र टैगोर, सरदार पटेल सब मौजूद थे. इस प्रस्ताव पर ये सभी महापुरुष सहमत थे. आजादी के बाद जब इसी गीत के इन्हीं दो अंतरों को राजेंद्र प्रसाद ने संविधान समिति में राष्ट्र गीत घोषित किया. तब करीब-करीब ये ही महापुरुष मौजूद थे. इनके साथ-साथ भीमराव अंबेडकर भी सभा में मौजूद थे. और मेरे सत्तापक्षा के नेता श्यामा प्रसाद मुखर्जी भी मौजूद थे. उस वक्त किसी ने इस पर आपत्ति नहीं जताई.
जितने साल नरेंद्र मोदी को पीएम के पद पर हो गए, करीब करीब उतने ही वर्षों नेहरू जेल में रहे थे. इस देश की आजादी के लिए. उसके बाद 17 साल के लिए पीएम रहे. आपको नेहरू से जितनी भी शिकायतें है या उन्हें जिनती गालियां देनी हैं, उसकी एक लिस्ट बना लीजिए. फिर हम एक समय तय करते हैं और उस पर बहस करेंगे. लेकिन उसके बाद यह मुद्दा खत्म हो जाना चाहिए. फिर हमें जनता के ज्वलंत मुद्दों पर चर्चा करनी होगी.

 

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