06 June, 2026 (Saturday)

(विचार-मंथन) गाजा पीस बोर्ड: शांति मंच या डोनाल्ड ट्रंप की बादशाहत? (लेखक- सनत जैन / ईएमएस)

डोनाल्ड ट्रंप द्वारा प्रस्तावित “गाजा पीस बोर्ड” का विचार जितना महत्त्वाकांक्षी है उतना ही विवादास्पद भी है। गाजा जैसे जटिल और संवेदनशील समेत संघर्षशील क्षेत्र के लिए एक नया अंतरराष्ट्रीय मंच डोनाल्ड ट्रंप खड़ा करके अपनी बादशाहत कायम करने दादागिरी कर अपना वर्चस्व बनाना चाहते हैं। जिस तरह से इस बोर्ड की संरचना, सदस्यता और नेतृत्व की रूपरेखा लेकर ट्रंप सामने आए हैं, उसने संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य स्थापित अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की भूमिका पर सीधी चुनौती देने का काम किया है। जहां तक भागीदारी का प्रश्न है, ट्रंप ने लगभग 50 देशों को निमंत्रण भेजा था। उनके आमंत्रण पर केवल 19 देशों की भागीदारी संभव हो पाई है। जो देश शामिल हुए हैं, उनमें अधिकांश छोटे और सीमित प्रभाव वाले देश हैं। इस पहली बैठक में यूरोपीय संघ के प्रमुख देश शामिल नहीं हुए। रूस, चीन और भारत जैसे देश भी इस बैठक में शामिल नहीं हुए। प्रभावशाली अरब राष्ट्र इस पहल में शामिल नही हैं। इससे स्पष्ट है कि डोनाल्ड ट्रंप के गाजा पीस बोर्ड के इस प्रस्ताव को दुनिया के देशों का समर्थन नहीं मिल रहा है। इस बोर्ड की वैधता और प्रभावशीलता पर प्रश्न चिन्ह लग गया है। शांति प्रक्रिया तभी टिकाऊ हो सकती है, जब तक कि उसमें वैश्विक स्तर की सभी क्षेत्रीय शक्तियाँ और शक्तिशाली देश शामिल नहीं हो जाते। ऐसी स्थिति में इस बोर्ड का कोई महत्व नहीं रहेगा। गाजा पीस बोर्ड की “भारी भरकम फीस” को लेकर भी कई देश इसमें शामिल होने के लिए तैयार नहीं है। शांति मंच का उद्देश्य किसी भी तरह के संघर्ष का समाधान बोर्ड के माध्यम से होना चाहिए। गरीब और छोटे देश को ना तो इसमें प्रतिनिधित्व मिलेगा और ना ही वह भारी भरकम फीस अदा कर पाएंगे। छोटे देश के लिए इसकी सदस्यता भी आर्थिक भार के रूप में सामने आ रही है, जिसके कारण ट्रंप के इस प्रस्ताव को कोई समर्थन मिलता हुआ दिख नहीं रहा है। सदस्यता शुल्क अधिक होने के कारण चुनिंदा देश ही इसे वहन कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में यह मंच वैश्विक स्थिति में कोई सार्थक भूमिका निभा पाएगा इस पर अपने आप पर प्रश्न चिन्ह लगता है। इससे यह भी आशंका पैदा होती है, कि कहीं यह पहल ट्रंप की पीस बोर्ड की आड़ में व्यापारिक परियोजना के रूप में तो नहीं लाई जा रही है।
सबसे संवेदनशील प्रश्न ट्रंप के “स्थाई अध्यक्ष” बनने के प्रस्ताव से जुड़ा हुआ है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में नेतृत्व आमतौर पर सामूहिक सहमति, रोटेशन और संतुलन के सिद्धांत पर आधारित होता है। स्थाई अध्यक्ष का विचार न केवल लोकतांत्रिक भावना के विरुद्ध है, बल्कि इस स्थिति में इस बोर्ड पर विश्वास करना भी कठिन हो जाता है। ट्रंप का यह प्रस्तावित बोर्ड उनके व्यक्तिगत प्रभाव और अमेरिकी वर्चस्व का एक उपकरण के रूप में देखा जा रहा है। क्या दुनिया के देश किसी एक राष्ट्र के नेता को स्थायी रूप से शांति प्रक्रिया का नेतृत्व देने में सहज रूप से विश्वास कर पाएंगे? इसमें संदेह है। संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय न्यायालय और मध्य पूर्व शांति प्रक्रिया से जुड़ी मौजूदा संस्थाएँ पहले से मौजूद हैं। इन संस्थाओं से अमेरिका अपनी दूरी बना रहा है। अमेरिका अपनी ताकत के बल पर उन्हें कमजोर करने में लगा हुआ है। ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप द्वारा समानांतर मंच खड़ा करना संस्थागत वैश्विक स्तर पर अराजकता की स्थिति पैदा कर सकता है। हर बड़ी शक्ति अपनी सुविधा को ध्यान में रखते हुए यदि इस तरह के “पीस बोर्ड” बनाएगी तो ऐसी स्थिति में वैश्विक व्यवस्था स्वयं खंडित हो जाएगी। गाजा पीस बोर्ड का विचार कागज पर आकर्षक लग सकता है। इसकी वर्तमान संरचना में सीमित भागीदारी, ऊँची फीस और डोनाल्ड ट्रंप का स्थाई अध्यक्ष बनने का प्रस्ताव, शांति का मंच कम और शक्ति-प्रदर्शन का मंच अधिक दिख रहा है। इस कारण दुनिया के देश इससे दूरी बनाकर चल रहे हैं। इस तरह के प्रस्ताव पर व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति, पारदर्शिता और संयुक्त राष्ट्र के साथ समन्वय के बिना आगे नही बढ़ा जा सकता है। इससे पहले तक ट्रंप द्वारा प्रस्तावित गाजा पीस बोर्ड का कोई भविष्य नहीं होगा। इस प्रस्ताव को लेकर जो राय सामने आ रही है उसमें कहा जा रहा है, कि डोनाल्ड ट्रंप स्थाई अध्यक्ष बनकर दुनिया के देशों को अपनी उंगलियों में नचाने की सोच रखते हैं। जिसके कारण डोनाल्ड ट्रंप इस बोर्ड को लेकर पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गए हैं।

Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *