06 June, 2026 (Saturday)

राष्ट्रीय संगोष्ठी में भारत बोध पुस्तक का मंत्री व कुलपति ने किया लोकार्पण

(सिद्धार्थनगर )।  माधव संस्कृति न्यास, नई दिल्ली द्वारा सिद्धार्थ विश्वविद्यालय में शनिवार को भारतीय इतिहास लेखन परंपरा: नवीन परिप्रेक्ष्य विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि बेसिक शिक्षा मंत्री डॉ. सतीश चंद्र द्विवेदी ने कहा कि आजादी के बाद इतिहास के संकलन का कार्य हो रहा है। देश को परम वैभव के शिखर पर ले जाने में युवा इतिहासकारों का संकलन कारगर साबित होगा। कार्यक्रम शुभारंभ के दौरान माखन लाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, नोएडा परिसर में सहायक प्राध्यापक डॉ. सौरभ मालवीय की लिखित पुस्तक भारत बोध समेत आठ अलग-अलग लोगों के पुस्तक का मंत्री व कुलपति द्वारा लोकार्पण किया गया।
डॉ. द्विवेदी ने कहा कि भारत को पिछड़े और सपेरों का देश कहा गया है, इस विसंगती को दूर करने का कार्य जारी है। भारत के स्वर्णिम इतिहास का संकलन हो रहा है। महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय (वर्धा, महाराष्ट्र) के कुलपति प्रो. रजनीश कुमार शुक्ल ने कहा कि युवा इतिहासकार भारत का इतिहास लिख सकते हैं। भारत का इतिहास उत्तान पाद, राम कृष्ण, समुद्र गुप्त, चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राम- कृष्ण से है। आजादी के पहले लिखे गए इतिहास में साम्राज्य को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इतिहास वेद, ज्ञान, यश, कृति, पुरूषार्थ और संघर्ष का होता है। इतिहास में सच्चाई दिखने वाला होता है। आजादी के पहले कारवां चलता गया, हिंदोस्तां बढ़ता गया के आधार पर इतिहास लिखा गया। गोरी चमड़ी वाले अंग्रेज भारत कमाने आए और यहीं रह गये। बाद में हमारा इतिहास लिख दिया। वास्कोडिगामा जान अपसटल को चिट्ठी देने के लिए खोज में निकला था, जिसे लोग भारत की खोज करता बताते हैं। इसी इतिहास को युवा इतिहासकार बदलेंगे। अखिल भारतीय इतिहास संकलन योजना के संगठन सचिव डॉ. बालमुकुंद पांडेय ने कहा कि अभी तक जिस इतिहास को भारत वर्ष में हम पढ़ते और पढ़ाते हैं वह दासता के प्रतिरूप का इतिहास है, जबकि भारत का सही इतिहास कभी उसके वास्तविक स्वरूप में प्रस्तुत नहीं किया गया था। नालंदा विश्वविद्यालय (बिहार) के कुलपति प्रो. वैद्यनाथ लाभ ने कहा कि डार्विन की थ्यौरी में बंदर से मनुष्य बनने की कल्पना बताया गया है, जबकि ब्रह्मा से मनुष्य की रचना हुई है। भगवान हमारे इष्ट हैं। ब्रिटिश इंडिया कंपनी ने हमे विकृति मानसिकता का बना दिया। हम दिन ब दिन अंग्रेजों की बेडियों में जकड़े गये। हमें सांस्कृतिक परंपरा का बोध नहीं था। स्वतंत्रता के पश्चात हम सांस्कृतिक पुर्नउत्थान के लिए खड़े हुए हैं। अंग्रेजों ने किताबों में ऐसी बातें लिखी कि हम हीन भावना से ग्रसित हुए। हमने ग्रंथ, वेद, रामायण, पुराण पढ़ना छोड़ दिया, लेकिन हमे सारस्वत सरस्वती का बोध यहीं हुआ है। सब सास्वत है। अध्यक्षता करते हुए कुलपति प्रो. सुरेंद्र दूबे ने कहा कि भारत का इतिहास केवल राजा रजवाड़ों और उनके ऐसे आराम का इतिहास नहीं है, बल्कि भारत का इतिहास लोक का इतिहास है। हम इसका सहज अनुभव राम राज्य से कर सकते हैं। कार्यक्रम का संचालन आईसीएचआर नई दिल्ली के निदेशक डॉ. ओम जी उपाध्याय व आभार डॉ. सच्चिदानंद चौबे ने किया। इस कार्यक्रम में आशा दूबे, डॉ. सौरभ मालवीय, सौरभ मिश्रा आनंद समेत 19 प्रांतों के 300 से अधिक विषय विशेषज्ञ व इतिहासरकार मौजूद रहे।
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