लोहिया संस्थान में ‘स्ट्रोक रेडी सेंटर’, ठंड में बढ़ा खतरा-पक्षाघात में बचेगी जान
ठंड में ब्रेन स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में इमरजेंसी में मरीजों की तादाद बढऩा तय है। लिहाजा, लोहिया संस्थान ‘स्ट्रोक रेडी सेंटर’ के तौर पर कार्य करेगा। यहां 24 घंटे ब्रेन स्ट्रोक का इलाज मुमकिन हो सकेगा।
शहर के तीन सरकारी संस्थानों केजीएमयू, पीजीआइ व लोहिया संस्थान में मरीजों को 24 घंटे भर्ती की व्यवस्था है। लोहिया संस्थान का न्यूरो सर्जरी विभाग स्ट्रोक रेडी सेंटर के तौर पर कार्य करेगा। कारण, यहां मरीजों के ब्रेन में जमे रक्त के थक्के को हटाने की संपूर्ण व्यवस्था है। विभाग के डॉ. कुलदीप यादव के मुताबिक, स्ट्रोक के मरीज की छोटी धमनी-बड़ी धमनी में जमे थक्के की डीएसए लैब में समयगत पुष्टि हो सकेगी। यहां इंटरनेशनल मानकों के आधार पर स्ट्रोक रेडी सेंटर कार्य करेगा।
20 फीसद मरीजों में दवा से नहीं हटता रक्त का थक्का
डॉ. कुलदीप यादव के मुताबिक, ब्रेन स्ट्रोक के 20 फीसद मरीजों में दवा से रक्त का थक्का नहीं हटता है। ऐसे में जिन अस्पतालों में डीएसए लैब की सुविधा नहीं होती है, वहां मरीजों की जिंदगी दांव पर बन जाती है। लोहिया संस्थान में ऐसे मरीज को तत्काल डीएसए लैब में शिफ्ट कर दिया जाएगा। मरीज में हल्का चीरा लगाकर नस में कैथेटर डालकर ब्रेन तक पहुंचा जाएगा। कैथेटर के जरिए रक्त का जमा थक्का सक्शन कर बाहर खींच लिया जाएगा। इससे ब्रेन में रक्त की बाधित आपूर्ति शुरू हो जाएगी। इश्चीमिक स्ट्रोक के इलाज के लिए सेंटर पर दवा व कैथेटर द्वारा जमा थक्का हटाने की दोनों सुविधाएं बेहद जरूरी हैं।
कम उम्र में होने लगा स्ट्रोक
डॉ. कुलदीप के मुताबिक, बोलने में दिक्कत होना, शरीर का संतुलन बिगडऩा, आंखों से दिखने में दिक्कत होना, हाथों में कमजोरी आने जैसे लक्षण होने पर सतर्क हो जाएं। ये स्ट्रोक के लक्षण हो सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों से स्ट्रोक के मरीज काफी बढऩे लगे हैं। पहले जहां 60 से 70 की उम्र में ब्रेन स्ट्रोक के मामले आ रहे थे। अब 20 से 40 की आयु में भी केस बढ़े हैं। स्ट्रोक के मरीज के लिए एक घंटा गोल्डेन ऑवर (सर्वाधिक महत्वपूर्ण समय) होता है। तीन घंटे में बीमारी सेकंड ग्रेड, साढ़े चार घंटे में थर्ड ग्रेड व छह घंटे में फोर्थ ग्रेड में पहुंच जाती है।
