टेक्नोलाजी का सकारात्मक उपयोग कई समस्याओं का समाधान, रोबोटिक्स में विजन के साथ बढ़ाएं कदम
इंजीनियरिंग करने के बावजूद स्नेह एंटरप्रेन्योर ही बनना चाहते थे, क्योंकि उन्हें हमेशा से ग्राहकों की समस्याओं का समाधान निकालने की इच्छा थी। कुछ साल कारपोरेट जगत में काम करने के बाद उन्होंने एक ऐसा प्रोडक्ट बनाने के बारे में सोचा, जिससे अभिभावकों के सामने आने वाली मुश्किलों का हल निकल सकता था, खासकर वैसे पैरेंट्स जो अपने बच्चों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते हैं।
स्नेह बताते हैं, ‘हमने बेंगलुरु में कुछ मांओं को बच्चों पर टैबलेट के इस्तेमाल पर चिल्लाते देखा था। उनसे बात करने के बाद पता चला कि पैरेंट्स चाहते हैं कि बच्चे टेक फ्रेंडली बनें, लेकिन उन्हें बच्चों का लंबे समय तक इंटरनेट, इंटरनेट मीडिया, प्ले स्क्रीन बेस्ड गेम्स खेलना या देखना पसंद नहीं था। हमें एहसास हुआ कि पैरेंट्स को ऐसी टेक्नोलाजी से रूबरू कराने की जरूरत है, जिससे बच्चे कुछ सीख सकें, उनका विकास हो सके। इस तरह, दो दोस्तों के साथ मिलकर शुरुआत हुई ‘इमोटिक्स’ की और ढाई साल के बाद 2016 में हमने पहला प्रोडक्ट ‘मिको’ लांच किया। यह रोबोट बच्चों के साथ लंबी बातचीत कर सकता है। उनसे सामान्य ज्ञान से लेकर पाठ्यक्रम संबंधी जानकारियां साझा कर सकता है।’
दोस्तों संग शुरुआत: स्नेह आगे बताते हैं कि प्रशांत अयंगर (सह-संस्थापक) और चिंतन रायकर (सह-संस्थापक) से उनकी मुलाकात आइआइटी बाम्बे में ही हुई थी। उन्हें रोबोटिक्स का जुनून-सा था। बाकियों की भी इसमें गहरी रुचि थी। इस तरह, तीनों ने पढ़ाई के दौरान ही रोबोट्स विकसित करने शुरू कर दिए थे। कालेज में वे गैरेज जैसे स्पेस में काम करते थे। उनका मकसद अलग-अलग एप्लीकेशंस के लिए रोबोट्स तैयार करना होता था। वहीं से यह तय हो गया कि आगे साथ मिलकर काम करना है। आज दुनिया के 140 देशों में कंपनी के प्रोडक्ट्स की आपूर्ति हो रही है। खासकर कोरोना काल में रोबोट्स की मांग तीन गुना बढ़ गई है।
निवेशकों से मिला सहयोग: एक हार्डवेयर स्टार्टअप शुरू करना कहीं से आसान नहीं है। बहुत कम निवेशकों को ही हार्डवेयर कंपनी के ग्रोथ कर्व की समझ होती है। स्नेह खुद को खुशनसीब मानते हैं कि उन्हें निवेशकों का बेहतर सहयोग एवं समर्थन मिला। वह बताते हैं, भारत जैसे विषम मार्केट में, जहां हर 200 किलोमीटर पर मानसिकता बदलती है, वहां कंपनी के बारे में लोगों को समुचित जानकारी देना चुनौतीपूर्ण रहा। इसी तरह, एक-दो प्रोटोटाइप तैयार करने से लेकर हजारों यूनिट्स के प्रोडक्शन पर काफी बारीकी से ध्यान देना पड़ा। हमने पूरा फोकस क्वालिटी पर दिया। आज मिको अगर देश के ढाई सौ के करीब स्टोर्स में उपलब्ध है, तो इसके पीछे हमारी टीम, नेटवर्क और चैनल पार्टनर्स की दृढ़ इच्छाशक्ति का कमाल है।
टीम के सहयोग से सफलता: स्नेह मानते हैं कि किसी भी स्टार्टअप इकोसिस्टम में टेक कंपनी बनाना आसान नहीं है, अगर आपके पास विजन एवं स्पष्टता न हो। वह कहते हैं, हमने पहला प्रोडक्ट 22 पायलट प्रोजेक्ट्स के बाद लांच किया। परफेक्ट माडल की तलाश में टीम की कई बैठकें हुईं। वैसे, मुङो अपनी टीम बनाने में उतनी मुश्किल नहीं रही, क्योंकि दोनों ही सह-संस्थापकों को मेरे जैसा ही रोबोटिक्स का जुनून था और वे भी ग्राहकों की समस्याओं का समाधान निकालने को लेकर प्रतिबद्ध थे। इसके अलावा, हमारी टीम के जुनूनी इंजीनियर्स, कलाकारों, मैथमेटिशियंस, डिजाइनर्स का अद्भुत मोटिवेशन राह को आसान बनाता रहा।
