05 June, 2026 (Friday)

मामला लीगल है 2 रिव्यू: कुर्सी बदली, तेवर बदले, बढ़ा वीडी त्यागी का रसूख, लेकिन फीका पड़ा पटपड़गंज का पुराना जादूपटपड़गंज कोर्ट की अतरंगी दुनिया में इस बार वीडी त्यागी वकील का काला कोट छोड़ जज की कुर्सी पर हैं। सीरीज में सिस्टम की चुनौतियां और नए सामाजिक केस तो हैं, लेकिन पिछले सीजन जैसी हंसी और पैनापन इस बार गायब है।

पटपड़गंज कोर्ट की अतरंगी दुनिया में इस बार वीडी त्यागी वकील का काला कोट छोड़ जज की कुर्सी पर हैं। सीरीज में सिस्टम की चुनौतियां और नए सामाजिक केस तो हैं, लेकिन पिछले सीजन जैसी हंसी और पैनापन इस बार गायब है।
न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी बंधी होती है, लेकिन पटपड़गंज के सत्र न्यायालय की गलियों में घूमने वाले किरदार अपनी आंखें हमेशा खुली रखते हैं, खासकर तब, जब मामला जुगाड़ और जिरह के बीच फंसा हो। साल 2024 में जब इस सीरीज का पहला सीजन आया था, तब इसने अपनी सादगी और जमीनी हास्य से दर्शकों के दिलों में जगह बनाई थी। अब इसका दूसरा सीजन डिजिटल प्लेटफॉर्म पर दस्तक दे चुका है। इस बार पटपड़गंज की हवा थोड़ी बदली हुई है, पुरानी यादें हैं, पुराने चेहरे हैं, लेकिन उन चेहरों की हैसियत और कुर्सियां बदल गई हैं। जहां पहला सीजन वकीलों की आपाधापी और अदालती दांव-पेंचों का एक कोलाज था, वहीं दूसरा सीजन न्याय व्यवस्था की ऊंची कुर्सियों और उस पद के साथ आने वाली दुविधाओं की कहानी बुनने की कोशिश करता है। यह सीजन यह देखने की एक उत्सुकता पैदा करता है कि क्या पटपड़गंज का वही पुराना आकर्षण बरकरार है या फिर इस बार कानूनी पेचीदगियों के बीच हंसी कहीं खो गई है।
कैसी है कहानी?
सीजन 2 की कहानी वहीं से सिरा पकड़ती है जहां पहला सीजन खत्म हुआ था, लेकिन एक बड़े उलटफेर के साथ। हमारे चहेते वकील विशेश्वर दयाल उर्फ वीडी त्यागी (रवि किशन) अब काले कोट और वकीलों की कैंटीन की राजनीति से ऊपर उठ चुके हैं। वे अब पटपड़गंज के प्रमुख जिला जज की कुर्सी पर विराजमान हैं। पटकथा का मुख्य केंद्र अब कोर्ट रूम की जिरह से हटकर जज साहब के चैंबर और उनके आंतरिक संघर्ष पर केंद्रित हो गया है। कहानी यह दिखाने की कोशिश करती है कि जब एक शातिर और जुगाड़ू वकील जज बनता है तो उसे निष्पक्षता और दोस्ती के बीच कैसी महीन रेखा खींचनी पड़ती है। वह अब अपने पुराने दोस्तों के साथ खुलकर हंस नहीं सकता, न ही उनके साथ समोसे तोड़ सकता है।

दूसरी तरफ वकीलों की दुनिया में भी हलचल कम नहीं है। सुजाता दीदी (निधि बिष्ट) और लखमीर मिंटू (अंजुम बत्रा) के बीच चैंबर के आधिपत्य को लेकर एक शीतयुद्ध चल रहा है। हार्वर्ड से पढ़कर आई अनन्या श्रॉफ (नाएला ग्रेवाल) अभी भी अपने आदर्शों और भारतीय अदालतों की कड़वी हकीकत के बीच सामंजस्य बिठाने की जद्दोजहद में है। लेखकों ने इस बार कहानी के फलक को विस्तार देने के लिए कई सामाजिक मुद्दों को छूने का प्रयास किया है, जैसे पुरुषों के खिलाफ उत्पीड़न कानूनों की कमी, वैवाहिक संपत्ति के अधिकार और समलैंगिक संबंधों से जुड़ी कानूनी उलझनें। हालांकि समस्या यह है कि ये सब प्लॉट मुख्य कहानी के साथ उस तरह से नहीं मिल पाते जैसे पिछले सीजन में हुआ था। पटकथा कई जगहों पर बिखरी हुई महसूस होती है और कुछ प्रसंगों को जरूरत से ज्यादा खींच दिया गया है, जिससे कहानी की रफ्तार सुस्त पड़ जाती है।

रवि किशन का रसूख और कलाकारों की टोली
अभिनय के मोर्चे पर यह शो पूरी तरह से रवि किशन के कंधों पर टिका हुआ है। वीडी त्यागी के किरदार में उन्होंने एक बार फिर साबित किया है कि देसी अंदाज और गंभीरता का मिश्रण उनसे बेहतर कोई नहीं कर सकता। एक जज के रूप में उनकी बॉडी लैंग्वेज, उनकी आंखों की चमक और संवाद अदायगी में जो ठहराव आया है, वह काबिले तारीफ है। वे जब चुप रहकर भी किसी वकील को घूरते हैं तो उस दृश्य में एक अलग तरह का प्रभाव पैदा होता है।

निधि बिष्ट ने सुजाता दीदी के रूप में अपनी कॉमिक टाइमिंग और स्क्रीन प्रेजेंस को बरकरार रखा है। उनके और अंजुम बत्रा के बीच की नोकझोंक सीरीज के कुछ हल्के-फुल्के पलों में से एक है। नाएला ग्रेवाल ने अनन्या के रूप में शानदार एक्टिंग की झलक पेश की है, हालांकि इस बार उनके किरदार को पहले जैसा ‘आर्क’ नहीं मिला। नई एंट्री के तौर पर कुशा कपिला ने वकील नैना अरोड़ा के रूप में एक आधुनिक और आक्रामक रुख पेश किया है। उनका आत्मविश्वास स्क्रीन पर दिखता है, लेकिन अफसोस कि उनके किरदार को गहराई देने में लेखक थोड़े कंजूस रहे।

विशेष उल्लेख दिव्येंदु भट्टाचार्य का होना चाहिए, जिन्होंने अपने रहस्यमयी और शांत अभिनय से सीरीज में एक नया आयाम जोड़ा है। उनकी मौजूदगी कहानी में एक ट्विस्ट की तरह काम करती है। कैमियो रोल में दिनेश लाल यादव निरहुआ ने भी अपनी छोटी सी उपस्थिति से ध्यान खींचा है, जो पूर्वांचली दर्शकों के लिए एक बोनस की तरह है।

निर्देशन और तकनीकी पहलू
निर्देशक राहुल पांडे ने पटपड़गंज कोर्ट की उस खास वाइब को बनाए रखने में सफलता हासिल की है। कोर्ट रूम की भीड़, चैंबरों की अव्यवस्था और सरकारी दफ्तरों वाली वह सुस्ती कैमरे के जरिए बखूबी पर्दे पर उतारी गई है। सिनेमैटोग्राफी सरल है और कहानी की मांग के अनुरूप है, जिसमें कोई फालतू के प्रयोग नहीं किए गए हैं।

तकनीकी रूप से देखें तो बैकग्राउंड स्कोर कहानी के मिजाज के साथ मेल खाता है और कई दृश्यों के प्रभाव को बढ़ाता है। हालांकि संपादन के स्तर पर इस बार काफी चूक नजर आती है। कई एपिसोड्स की अवधि को कम किया जा सकता था। कुछ सीन ऐसे हैं जो अपनी बात कहने के बाद भी बेवजह खिंचते रहते हैं, जिससे दर्शक का ध्यान भटकने लगता है। सीरीज का पेसिंग ग्राफ ऊपर-नीचे होता रहता है, जो एक ओटीटी स्टाइल ड्रामा के लिए थोड़ा जोखिम भरा साबित होता है। प्रोडक्शन डिजाइन प्रभावी है, जो एक असली जिला अदालत की धूल और फाइलों के बीच वाली दुनिया का अहसास कराता है।

वो कमियां जहां ‘लीगल मामला’ थोड़ा ढीला पड़ा
इस सीजन की सबसे बड़ी कमी इसकी लेखनी की धार है। पहला सीजन अपनी अप्रत्याशित कॉमेडी और दिलचस्प केसेज के लिए जाना गया था। इस बार मेकर्स ने सिस्टम और पावर पॉलिटिक्स दिखाने के चक्कर में उस मौलिक हास्य को थोड़ा पीछे छोड़ दिया है। वकीलों के चैंबर वाले ट्रैक इस बार थोड़े दोहराव वाले और उबाऊ लगते हैं। अनन्या और नैना के बीच की प्रतिद्वंद्विता को जिस तरह से बिल्ड-अप मिला था, उसका निष्कर्ष उतना प्रभावशाली नहीं रहा। इसके अलावा सीरीज कई जगहों पर जरूरत से ज्यादा ज्ञानवर्धक बनने की कोशिश करती है, जिससे मनोरंजन का ग्राफ गिर जाता है। जो केस पेश किए गए हैं, उनमें वह चमक नहीं है जो पिछले सीजन के तोते वाले केस या अन्य विचित्र मामलों में थी। दर्शक जब किसी कोर्टरूम कॉमेडी को देखते हैं तो वे तीखी जिरह और मजेदार फैसलों की उम्मीद करते हैं, जो इस बार कम देखने को मिले।

एक बार देखने लायक
‘मामला लीगल है: सीजन 2’ एक ऐसी सीक्वल है जो अपने पिछले गौरव को छूने की कोशिश तो करती है, पर पूरी तरह सफल नहीं हो पाती। यह बुरा नहीं है, लेकिन यह उतना शानदार भी नहीं है जितना कि पहला सीजन था। यह शो अब एक शानदार कॉमेडी से हटकर एक कैरेक्टर स्टडी और सिस्टम ड्रामा की ओर झुक गया है। रवि किशन का दमदार अभिनय और पटपड़गंज की दुनिया से पुराना लगाव ही इस सीरीज को देखने की सबसे बड़ी वजह है। यदि आप पहले सीजन के प्रशंसक रहे हैं और वीडी त्यागी के सफर को आगे बढ़ते देखना चाहते हैं तो यह सीजन आपको निराश नहीं करेगा, लेकिन यदि आप पेट पकड़कर हंसने वाले पलों की उम्मीद कर रहे हैं तो आपको अपनी उम्मीदें थोड़ी कम रखनी होंगी। ‘मामला लीगल है 2’ में नियत तो साफ है, लेकिन मनोरंजन का पलड़ा इस बार थोड़ा हल्का रह गया है। यह सीजन आउट ऑफ कोर्ट सेटलमेंट जैसा है, काम चलाऊ और संतोषजनक, पर यादगार नहीं। पटपड़गंज की यह अदालत इस बार सिर्फ वीडी त्यागी के रसूख के दम पर अपनी कार्यवाही पूरी करती है।

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