07 March, 2026 (Saturday)

एग्जाम सेंटर पर रही अनुपस्थित, फिर भी बनी राज्य टॉपर, अब मिली 5 साल जेल की सजा

छत्तीसगढ़ से 17 साल बाद एक हैरान कर देने वाली खबर सामने आई है। यहां साल 2008 में स्टेट टॉप करने वाली छात्रा कोई असल टॉपर नहीं बल्कि फर्जी करार हुई है। सेकेंड एडिशनल सेशन जज गणेश सम पटेल ने टॉपर फर्जी टॉपर छात्रा समेत 4 लोगों को दोषी मानते हुए इन चारों को 5-5 साल की सजा सुनाई गई है। दोषियों में छात्रा पोराबाई के अलावा उस समय स्कूल का प्रिंसिपल, सेंटर का अध्यक्ष और टीचर शामिल है।
दरअसल, इस मामले का खुलासा तब हुआ जब माध्यमिक शिक्षा मंडल के चेयरमैन बीकेएस रे गांव की रहने वाली पोराबाई को स्टेट टॉपर के रूप में सम्मानित करने के बारे में सोचा। इससे पहले उन्होंने अधिकारियों से पोराबाई की कॉपी मंगवाई, ताकि वो देख सके कि आखिर इस बच्ची ने किस तरीके से प्रश्नों के जवाब दिए हैं, जिसके कारण वह स्टेट टॉपर बन गई।
कॉपी में दिखे फर्जीवाड़े के क्लू
बस यहीं से फर्जीवाड़े की बू आने शुरु हो गए। जब उन्होंने कॉपी चेक किया तो उसमें लिखावट साफसुथरी थी। प्रश्नों के जवाब एकदम सही दिया गया था, और जवाब देने का तरीका भी शानदार था। इंग्लिश के शब्द भी इतने शानदार तरीके से बिठाए गए थे जिसे देखकर कोई अंदाजा ही नहीं लगा सकता कि यह किसी गांव की लड़की ने लिखा है। ये सब देखने के बाद बीकेएस रे का तुरंत जवाब आया कि ये सब फर्जी है।
पुराने रिकॉर्ड में चौंकाने वाले खुलासे
फर्जी की आशंका होने के बाद छात्रा के पुराने रिकॉर्ड खंगाले गए, जिसमें पता लगा कि वह तो कभी भी फर्स्ट डिविजन भी हासिल नहीं की है। हमेशा सेकेंड या थर्ड ही रही है। कहीं-कहीं तो फेल भी हुई है। यही नहीं जब मीडिया ने सवाल किया तो उसने खुद टॉपर आने पर हैरानी जताई। इसके अलावा शिक्षा मंडल के चेयरमैन को एक और चीज अखरी। अलग-अलग पेपर में अलग-अलग हैंडराइटिंग।
एग्जाम सेंटर भी नहीं पहुंची थी छात्रा
फर्जीवाड़ा यहीं नही रूका। जब इस मामले में जांच शुरु हुई तो पाया गया कि जहां छात्रा का एग्जाम सेंटर था, वह वहां एग्जाम देने भी नहीं पहुंची थी। मतलब साफ हो गया था कि उसके बदले किसी और ने पेपर दिए। शिक्षा मंडल चेयरमैन की शिकायत पर पोराबाई और बाकी आरोपियों को जेल भेजा गया। लेकिन 12 साल बाद संतोषजनक सबूत नहीं मिले तो उन्हें बरी कर दिया गया। लेकिन शिक्षा मंडल ने हार नहीं मानी और आखिरकार उनकी जीत हुई।
नीचली अदालत में हुए थे बरी
बता दें कि यह फैसला इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि सबूतों के अभाव में निचली अदालत में ये बरी हो गए थे। लेकिन छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा बोर्ड ने फिर से अपील की। इस एक केस ने नकल के काले धंधे को भी उजागर किया, जिसके बाद कानून कड़े किए गए।

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