11 March, 2026 (Wednesday)

किशोरों को सर्वाइकल कैंसर व सड़क दुर्घटनाओं से बचाने की एक सार्थक पहल! (लेखक- डॉ श्रीगोपाल नारसन /ईएमएस)

दुनिया के 180 देशों की मुश्किलों जगहों में वंचित बच्चों तक पहुंच बनाने और काम करने को समर्पित यूनिसेफ ने किशोरों को सर्वाइकल कैंसर व सड़क दुर्घटनाओं से बचाने हेतु जागृति हेतु नई पहल शुरू की है।

किशोर स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों पर मीडिया की भूमिका को सशक्त बनाने के उद्देश्य यूनिसेफ इंडिया द्वारा आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय ट्रेनर्स ऑफ ट्रेनर्स वर्कशॉप’ हाल ही में नई दिल्ली में संपन्न हुई है। वर्कशॉप के उद्घाटन सत्र में यूनिसेफ इंडिया की कम्युनिकेशन प्रमुख जाफरिन चौधरी ने कहा, ‘युवा उन स्वास्थ्य मुद्दों पर सटीक जानकारी पाने के हकदार हैं, जो उन्हें और समाज को प्रभावित करते हैं। यह तभी संभव है जब वैज्ञानिक और चिकित्सीय जानकारी को मीडिया के जरिए सटीक और जिम्मेदारी से लोगों तक पहुंचाया जाए। गलत जानकारी से लड़ने का सबसे अच्छा तरीका यही है। हमें सीखना, विश्लेषण करना और समझना होगा कि कैसे तकनीकी जानकारी को प्रस्तुत किया जाए ताकि लोग उसे समझें और उस पर भरोसा करें ।

उनका मानना था कि ‘ सर्वाइकल कैंसर, सड़क सुरक्षा और ऐसे कई अन्य मुद्दों पर जागरूकता को पत्रकारों में क्रिटिकल अप्रेजल स्किल्स’ यानी तथ्यों की गहराई से जांचने की क्षमता के माध्यम से और बेहतर तरीके से समझाया व प्रसारित किया जा सकता है। वरिष्ठ संपादकों के मार्गदर्शन में इस दिशा में यूनिसेफ पिछले एक दशक से प्रयासरत है।

यूनिसेफ इंडिया कंट्री ऑफिस के स्वास्थ्य प्रमुख (कार्यकारी) डॉ. विवेक वीरेंद्र सिंह ने कहा, ‘सर्वाइकल कैंसर ऐसा एकमात्र कैंसर है जिसे वैक्सीन से रोका जा सकता है। जागरूकता इस बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है। मीडिया समाज में व्याप्त झिझक और गलत धारणाओं को तोड़ने में अहम भूमिका निभा सकता है। अगर मीडिया इस विषय को वर्जित मुद्दे के रूप में नहीं, बल्कि एक साझा सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में प्रस्तुत करे तो महिलाएं समय पर मदद ले सकेंगी। हर सटीक और संवेदनशील खबर हमें उस भविष्य के और करीब ले जाती है, जहां कोई भी महिला एक रोकी जा सकने वाली बीमारी से अपनी जान न गंवाए।”

डॉ.विवेक वीरेंद्र सिंह ने कहा, ‘हर दुर्घटना रोकी जा सकती है और मीडिया सड़क सुरक्षा को एक साझा सामाजिक और शासन के मुद्दे के रूप में फिर से परिभाषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। जिसके लिए त्रासदी के बाद की सहानुभूति के बजाय डेटा-आधारित जवाबदेही की आवश्यकता है। अगर मीडिया, नीति निर्माताओं और नागरिक डेटा प्लेटफॉर्म के बीच मजबूत तालमेल बना सके, तो सड़क सुरक्षा से जुड़ी खबरें रोकथाम, कानून के पालन और समानता पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकेंगी’
स्वास्थ्य विषयों में संपादकों की रणनीतिक भागीदारी के लिए कार्यशाला कार्यशाला का विषय ‘उभरती किशोर स्वास्थ्य चुनौतियां – सर्वाइकल कैंसर और सड़क सुरक्षा आयोजित की गई। उल्लेखनीय है कि देश में साल 2022 में देश में सर्वाइकल कैंसर के लगभग 79,103 नए मामले दर्ज किए गए और 34,805 महिलाओं की इस बीमारी से मृत्यु हुई — जबकि यह एक ऐसी बीमारी है जिसे रोका जा सकता है। वहीं दूसरी ओर सड़क सुरक्षा पर एक विशेष सत्र में बताया गया कि भारत में हर साल 150,000 से अधिक लोग सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते हैं, जिसमें बच्चे और युवा सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। वर्कशॉप में किशोर स्वास्थ्य से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों, खासतौर पर सर्वाइकल कैंसर की रोकथाम और सड़क सुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाने के लिए मीडिया से अपनी भूमिका को और मजबूत करने का आह्वान किया गया।

वर्कशॉप में वरिष्ठ स्वास्थ्य संपादकों के साथ क्रिटिकल अप्रेजल स्किल्स’ यानी तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग और रणनीतिक तरीके से स्टोरी पेश करने की तकनीकों पर विस्तार से चर्चा की गई।इसका मकसद था किशोरों के स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर अधिक प्रभावी और जिम्मेदार पत्रकारिता को बढ़ावा दिया जा सके।

इस वर्कशॉप में पूरे भारत से वरिष्ठ संपादक, स्वास्थ्य पत्रकार, मीडिया एजुकेटर और सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ एक साथ आए। इसका उद्देश्य सर्वाइकल कैंसर और सड़क सुरक्षा पर तथ्यों पर आधारित, निरंतर और मानव-केंद्रित रिपोर्टिंग को मजबूत करना था । निस्संदेह, ये भारत की दो सबसे गंभीर, लेकिन कम रिपोर्ट की जाने वाली सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौतियां हैं। प्रतिभागियों ने न्यूजरूम के भीतर की व्यवस्थागत बाधाओं की जांच की, गलत सूचनाओं का मुकाबला करने में मीडिया की भूमिका पर चर्चा की और साथ ही सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े आंकड़ों को लोगों की असली जिंदगी की कहानियों से जोड़ने के लिए रणनीतियां भी तैयार की।

यूनीसेफ की कम्युनिकेशन्स आफिसर सोनिया सरकार ने बताया कि एम्स के प्रिवेंटिव ऑन्कोलॉजी विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. पल्लवी शुक्ला; निमहंस के डब्ल्यूएचओ सहयोग केंद्र के प्रमुख डॉ. गौतम एम. सुकुमार और मध्य प्रदेश में यूनिसेफ के चीफ ऑफ फील्ड ऑफिसर अनिल गुलाटी
ने भी वर्कशॉप में भाग लेने वाले संपादकों को संबोधित किया।

उल्लेखनीय है कि प्रतिभागियों ने छह संपादकीय समूहों में काम किया ताकि किशोरियों के स्वास्थ्य, खासकर सर्वाइकल कैंसर और सड़क सुरक्षा से जुड़े मुद्दों की बेहतर कवरेज के लिए न्यूजरूम की रणनीतियां तैयार की जा सकें। संपादकों ने यह भी पता लगाया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल्स डेटा विश्लेषण, शोध अनुवाद और तथ्यों पर आधारित रिपोर्टिंग में कैसे मदद कर सकते हैं। साथ ही वैज्ञानिक शोध को क्षेत्रीय और भाषाई मीडिया के लिए सुलभ बनाने के तरीकों पर भी चर्चा की गई।
यह वर्कशॉप क्रिटिकल अप्रेजल स्किल्स फ्रेमवर्क के अंतर्गत आयोजित की गई थी, जो यूनिसेफ समर्थित पहल है। इसे 2014 में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मास कम्युनिकेशन, ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी और थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन के साथ साझेदारी में शुरू किया गया था।

उल्लेखनीय है कि प्रशिक्षित सलाहकार अब मास्टर ट्रेनर बनकर महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, बिहार, राजस्थान और कर्नाटक में पत्रकारों के लिए राज्य स्तरीय वर्कशॉप आयोजित करेंगे। ये गलत सूचनाओं को दूर करने, रिपोर्टिंग की गुणवत्ता में सुधार करने और सर्वाइकल कैंसर और सड़क सुरक्षा पर जिम्मेदार, डेटा पर आधारित जानकारी को बढ़ावा देने के लिए भाषाई मीडिया की क्षमताओं को मजबूत करेंगे।ऐसी उम्मीद की जा रही है।(लेखक ज्वलंत मुद्दों के वरिष्ठ पत्रकार है)

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