Ek Din Review: जापान की वादियों में गुम हुई ‘एक दिन’ की मोहब्बत, फीकी रह गई साई पल्लवी की बॉलीवुड एंट्री
जापान की बर्फीली वादियों में सेट ‘एक दिन’ एकतरफा प्यार और याददाश्त खोने की बीमारी पर आधारित है। साई पल्लवी की मासूमियत और सुंदर दृश्यों के बावजूद जुनैद खान के साथ उनकी फीकी केमिस्ट्री और कमजोर लेखन फिल्म को बेजान बना देता है।
फिल्म रिव्यू:
एक दिन
स्टार रेटिंग
2/5
पर्दे पर:
01/05/2026
डायरेक्टर:
सुनील पांडे
शैली:
रोमांटिक ड्रामा
बॉलीवुड में प्रेम कहानियों का कोई एक तय फॉर्मूला नहीं होता। कभी संगीत जादू चला देता है तो कभी किरदारों की गहराई दर्शकों के दिलों को छू लेती है। लेकिन एक सफल रोमांटिक फिल्म की सबसे बड़ी कसौटी होती है उसके मुख्य कलाकारों के बीच की केमिस्ट्री। जब स्क्रीन पर दो लोग मिलते हैं तो वह अनकहा खिंचाव ही फिल्म को ऊंचाई पर ले जाता है। निर्देशक सुनील पांडे की फिल्म ‘एक दिन’ इसी जादुई खिंचाव को पकड़ने की कोशिश करती है, लेकिन अफसोस कि यह कोशिश केवल बर्फीले पहाड़ों और खूबसूरत नजारों तक ही सिमट कर रह जाती है। जुनैद खान और साई पल्लवी जैसे कलाकारों को साथ लाने वाली यह फिल्म एक दिलचस्प विचार से शुरू तो होती है पर अंत तक आते-आते अपनी ही उलझनों में दम तोड़ देती है।
एक पुराना फॉर्मूला, नए कलेवर में
फिल्म की कहानी ‘दिनेश’ (जुनैद खान) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो नोएडा की एक आईटी कंपनी में काम करने वाला एक सीधा-साधा, अंतर्मुखी और खुद को ‘अदृश्य’ मानने वाला युवक है। वह अपनी सहकर्मी ‘मीरा’ (साई पल्लवी) से एकतरफा और खामोश मोहब्बत करता है। कहानी में मोड़ तब आता है जब ऑफिस की पूरी टीम एक ‘ऑफसाइट’ ट्रिप के लिए जापान जाती है। जापान जाने की वजह भी काफी फिल्मी है, मीरा को जापानी संस्कृति और वहां की बर्फीली वादियों से बेहद लगाव है।
वहां मीरा की जिंदगी में एक इमोशनल मोड़ आता है, जिसके बाद एक हादसे में उसे TGA (ट्रांजिएंट ग्लोबल एमनेशिया) नाम की बीमारी का पता चलता है। यह एक ऐसी स्थिति है जहां इंसान की याददाश्त एक खास हिस्से के बाद धुंधली हो जाती है और वह अगले दिन कुछ भी नया याद नहीं रख पाता। दिनेश, जिसे मीरा कभी नोटिस भी नहीं करती थी, जापानी देवताओं से प्रार्थना करता है कि काश मीरा बस एक दिन के लिए उसे प्यार कर ले। उसकी दुआ कुबूल होती है, लेकिन एक शर्त के साथ अगली सुबह मीरा को इस ‘एक दिन’ का कुछ भी याद नहीं रहेगा।
पटकथा के स्तर पर यह विचार 2000 के दशक के उन धारावाहिकों की याद दिलाता है जहां परिस्थितियां बहुत बनावटी लगती थीं। 2026 के दौर में जब दर्शक तार्किक और परिपक्व कहानियों की मांग कर रहे हैं, ‘एक दिन’ की कहानी काफी कमजोर और घिसी-पिटी महसूस होती है। लेखक दिनेश को एक ‘ग्रीन फ्लैग’ (आदर्श पुरुष) के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं, लेकिन फिल्म उसे एक ऐसे प्रेमी के रूप में दिखाती है जो किसी की बीमारी का फायदा उठाकर अपनी हसरत पूरी करना चाहता है, जो थोड़ा अजीब लगता है।
अभिनय
अभिनय की बात करें तो साई पल्लवी अपनी इस हिंदी डेब्यू फिल्म में भी ईमानदारी दिखाती हैं। उनके चेहरे की मासूमियत और खामोश पलों में उनकी संवेदनशीलता फिल्म के सबसे मजबूत पहलुओं में से एक है। वह मीरा के किरदार में जान फूंकने की पूरी कोशिश करती हैं, लेकिन पटकथा उन्हें एक स्वतंत्र महिला के बजाय एक लाचार किरदार के रूप में अधिक पेश करती है।
वहीं जुनैद खान ने अपनी पिछली परफॉर्मेंस की तुलना में खुद को काफी नियंत्रित रखा है। दिनेश के रूप में उनकी सादगी दिखती है, लेकिन एक अभिनेता के तौर पर उनमें वह ‘स्क्रीन प्रेजेंस’ अभी भी नदारद है जो दर्शक को बांधे रख सके। अभिनय में ठहराव होना अच्छी बात है, लेकिन जब वह ठहराव फिल्म को सुस्त बनाने लगे तो समस्या खड़ी होती है। कुणाल कपूर एक छोटे लेकिन प्रभावी कैमियो में नजर आए हैं पर उनके पास करने के लिए कुछ खास नहीं था।
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी जुनैद और साई पल्लवी के बीच केमिस्ट्री का अभाव है। पूरी फिल्म में ऐसा एक भी पल नहीं आता जहां दर्शक को लगे कि ये दोनों एक-दूसरे के प्यार में हैं। उनके बीच का आकर्षण इतना ठंडा है कि कई बार वे प्रेमी-प्रेमिका के बजाय दूर के रिश्तेदार या परिचित अधिक लगते हैं। जब रोमांस में ‘स्पार्क’ ही न हो तो दर्शक कहानी से जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष
सुनील पांडे का निर्देशन तकनीकी रूप से तो सक्षम है, लेकिन भावनात्मक रूप से फिल्म फीकी रह गई है। उन्होंने जापान की खूबसूरती को पर्दे पर उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। सिनेमैटोग्राफी इस फिल्म का सबसे बड़ा प्लस पॉइंट है। होक्काइडो की बर्फ से ढकी सड़कें, सॉफ्ट विंटर लाइट और पोस्टकार्ड जैसे फ्रेम आपको फिल्म देखने के बजाय जापान की टिकट बुक करने के लिए अधिक प्रेरित करेंगे। विजुअली यह फिल्म एक शानदार ‘ट्रैवल वाउचर’ जैसी लगती है।
संगीत की बात करें तो अरिजीत सिंह का एक गाना है, जो सुनने में मधुर है लेकिन फिल्म खत्म होते ही आप उसे भूल जाते हैं। एडिटिंग भी कुछ खास प्रभावी नहीं है, फिल्म की गति कई जगह इतनी धीमी हो जाती है कि यह दर्शकों के धैर्य की परीक्षा लेने लगती है। रिलीज की टाइमिंग भी फिल्म के खिलाफ जाती है; यह अप्रैल की तपिश के बजाय सर्दियों या वैलेंटाइन डे के मौके पर अधिक प्रासंगिक लग सकती थी।
निर्देशकीय विजन
फिल्म थाई फिल्म ‘वन डे’ की आधिकारिक रीमेक है, लेकिन रीमेक बनाते समय इसे भारतीय संवेदनाओं के साथ उस तरह नहीं जोड़ा गया कि यह मौलिक लगे। निर्देशक ने दिनेश को ‘लाइकएबल नर्ड’ (एक प्यारा किताबी कीड़ा) बनाने की कोशिश की, लेकिन वह एक ऐसा पात्र बनकर रह गया जो अपनी ही दुनिया में खोया हुआ है। फिल्म यह संदेश देने की कोशिश करती है कि निस्वार्थ प्रेम क्या होता है, लेकिन कहानी की बुनावट में वह गहराई गायब है।
वर्डिक्ट
‘एक दिन’ एक ऐसी फिल्म है जिसमें नियत तो साफ है, लेकिन नतीजे संतोषजनक नहीं हैं। यह बॉलीवुड को उसी पुरानी ‘क्लीन रोमांस’ वाली शैली में वापस ले जाने की कोशिश करती है, जो आज के हिंसक और डार्क कंटेंट के बीच एक राहत की बात हो सकती थी पर इस कोशिश में ‘रूह’ गायब है। खूबसूरत जापान, साई पल्लवी की मुस्कान और अच्छी सिनेमैटोग्राफी के बावजूद फिल्म अपनी सुस्त रफ्तार और मुख्य जोड़ी के बीच ठंडी केमिस्ट्री के कारण डूब जाती है। यह एक ऐसी कहानी है जो पर्दे पर आती है और बिना कोई गहरा निशान छोड़े ओझल हो जाती है, ठीक उसी तरह जैसे फिल्म की नायिका की एक दिन की याददाश्त। अगर आप सिर्फ जापान की सैर करना चाहते हैं और ठंडी वादियों के विजुअल्स देखना पसंद करते हैं तो इसे एक बार देख सकते हैं। नहीं तो, इस प्रेम कहानी में ऐसा कुछ भी नया नहीं है जो आपको याद रह जाए।
