06 June, 2026 (Saturday)

विवाह व्यवस्था को पुरुष प्रधानता की छाया से निकलना होगा, समानता-सम्मान जरुरी

मद्रास हाईकोर्ट ने भारतीय विवाह को लेकर की टिप्पणी, कहा- सुधार की जरुरत
चैन्नई,(ईएमएस)। मद्रास हाईकोर्ट ने देश में विवाह को लेकर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि भारतीय विवाह व्यवस्था को पुरुष प्रधानता की छाया से निकलना होगा। इसे समानता और आपसी सम्मान की रोशनी में विकसित करना चाहिए। जज एल विक्टोरिया गौरी ने कहा कि खराब विवाहों में महिलाओं का सहन करना गलत है। यह पीढ़ियों से पुरुषों को महिलाओं को नियंत्रित और दबाने के लिए प्रोत्साहित करता है। जज ने यह टिप्पणी 1965 में विवाह करने वाले बुजुर्ग दंपति के वैवाहिक विवाद से संबंधित फैसला सुनाते हुए की।
कोर्ट की ओर से कहा गया कि इस मामले में पीड़िता उस पीढ़ी की भारतीय महिलाओं का प्रतीक है जिन्होंने लगातार मानसिक और भावनात्मक क्रूरता झेली। यह आशा करते हुए कि सहनशीलता उनका गुण और कर्तव्य है। ऐसी गलत सहनशीलता को अक्सर सामाजिक कथाओं में महिमामंडित किया जाता है। इसने पीढ़ियों के पुरुषों को पितृसत्तात्मक विशेषाधिकार के नाम पर नियंत्रण, प्रभुत्व और उपेक्षा करने के लिए प्रोत्साहित किया है।
हाईकोर्ट ने जोर दिया कि पुरुषों को यह विरासत में मिली धारणा छोड़नी होगी कि विवाह उन्हें निर्विवाद अधिकार देता है। उन्हें यह समझना होगा कि उनकी पत्नियों की सुविधा, सुरक्षा, जरूरतें और गरिमा कर्तव्य नहीं, बल्कि वैवाहिक बंधन के मूल दायित्व हैं। खासकर उनके जीवन के अंतिम सालों में। पत्नियों के खिलाफ घरेलू हिंसा के कानून पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा कि जब कानून महिलाओं को अपनी सुरक्षा प्रदान करता है, तो वह ऐसा केवल सजा देने के लिए नहीं बल्कि सामाजिक चेतना जगाने के लिए करता है। हालांकि, अदालतें पारिवारिक विवादों के अत्यधिक आपराधिकरण को लेकर सतर्क रहती हैं, लेकिन घरेलू क्रूरता को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं।

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