अमेरिका ने कहा- अफगानिस्तान मिशन से काफी कुछ सीखा, तालिबान को बताया क्रूर संगठन
अमेरिका के ज्वाइंट चीफ आफ स्टाफ के चेयरमेन जनरल मार्क माइले ने कहा है कि तालिबान शुरुआत से ही एक क्रूर और निर्दयी संगठन रहा है। अपने निजी अनुभवों के आधार पर उन्होंने कहा कि इसका कोई भविष्य नहीं है। ये देखना काफी दिलचस्प होगा कि वो अपने में बदलाव लाता है या नहीं। लिहाजा इसके भविष्य को लेकर कुछ नहीं कहा जा सकता है। जनरल मार्क ने ये बातें पेंटागन में हुई प्रेस कांफ्रेंस के दौरान कही हैं।
ये पूछे जाने पर कि क्या आगे तालिबान के साथ किसी तरह का सहयोग किया जाएगा, उन्होंने कहा कि जहां तक अमेरिका का तालिबान से लड़ाई के मैदान में और इसके बाहर उसे डील करने का अनुभव रहा है, खतरों को कम करने के लिए उन्हें काम करना होगा। ये तय नहीं है कि वो ऐसा करेंगे भी या नहीं।
रक्षा मंत्री लायड आस्टिन का कहना था कि अमेरिका ने तालिबान के साथ मिलकर बेहद कम मुद्दों पर ही काम किया है। इसमें से सबसे अहम वहां से लोगों को सुरक्षित बाहर निकालना था, जो संभव हो पाया। उन्होंने ये भी कहा कि वो किसी तरह के सीमा विवाद पर नहीं जाना चाहते हैं। वो केवल इतना ही कहना चाहते हैं कि उन्हें अपने जवानों पर गर्व है कि उन्होंने ये सब कर दिखाया। ये पहले से सोचना काफी मुश्किल है कि तालिबान आने वाले दिनों में कैसा होगा।
अमेरिका के रेस्क्यू मिशन पर जनरल माइले ने कहा कि अमेरिका ने वहां पर करीब 5 से 6 हजार जवानों को तैनात किया हुआ था। कुछ फार्वर्ड पोस्ट पर भी थे। अमेरिका के विमानों ने इस दौरान 387 उड़ान भरकर लोगों को वहां से बाहर निकाला। इसमें सी-17 ग्लोबल मास्टर और सी-130 जे विमान शामिल किए गए। इसके अलावा दूसरे विमानों ने करीब 391 उड़ान भरी। इस तरह से करीब 778 उड़ानों के जरिए 124334 लोगों को सुरक्षित काबुल से बाहर निकाला गया। इनमें छह हजार अमेरिकी सैनिक थे।
माइले ने ये भी कहा कि अमेरिका आगे भी विदेश मंत्रालय के सहयोग से काबुल से आने वालों को बाहर निकालेगा। ये काम वो अब डिप्लोमेटिक मिशन के माध्यम से करेगा। काबुल से आने वाले अफगानियों को दुनिया के विभिन्न देशों में बने अमेरिकी बेस पर उतारा गया है। इनमें से करीब 20 हजार को पांच देशों में, 23 हजार को यूरोप के चार देशों में और करीब 20 हजार को अमेरिकी महाद्वीप के अलग-अलग जगहों पर उतारा गया है।
इस मिशन के दौरान अमेरिका को अपने 11 मरीन गंवाने पड़े। इसमें 22 अमेरिकी जवान घायल हुए। काबुल एयरपोर्ट पर हुए हमले में करीब 100 अफगान नागरिक मारे गए और घायल भी हुए। अब जबकि ये मिलिट्री मिशन पूरी तरह से खत्म हो चुका है तो हमें इस अनुभव से काफी कुछ सीखने की जरूरत है।
