07 June, 2026 (Sunday)

अफगानिस्तान पर टाप गियर में भारतीय कूटनीति, विदेश मंत्री जयशंकर आज करेंगे पीएम इमरान के साथ मंच साझा

अफगानिस्तान के बिगड़ते हालात को देख भारत की कूटनीतिक गतिविधियां भी काफी तेज हो गई हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर न सिर्फ अफगानिस्तान के शीर्ष नेताओं से लगातार संपर्क में हैं बल्कि वहां के हालात को लेकर जिन दूसरे देशों की गहरी रुचि हैं उनके साथ भी लगातार विमर्श कर रहे हैं।

पिछले तीन दिनों में दुशांबे (ताजिकिस्तान) में कई देशों के साथ विमर्श के बाद जयशंकर गुरुवार को ताशकंद (उज्बेकिस्तान) पहुंचे हैं जहां शुक्रवार को एक अहम बैठक में वह हिस्सा लेंगे। इस बैठक में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति अशरफ घनी, पाकिस्तान के पीएम इमरान खान, अफगान मामले पर अमेरिका के विशेष प्रतिनिधि जाल्मई खलीलजाद समेत कई मध्य एशियाई देशों के शीर्ष नेता होंगे। माना जा रहा है कि अफगानिस्तान के मुद्दे पर भारत की अमेरिका, रूस और चीन के साथ अलग अलग स्तर पर संपर्क में है।

गुरुवार का दिन विदेश मंत्री जयशंकर के लिए काफी गतिविधियों वाला रहा। पहले उनकी दुशांबे में ताजिकिस्तान के विदेश मंत्री सिरोजिद्दीन मुहरिद्दीन के साथ द्विपक्षीय वार्ता हुई और जब वे ताशकंद पहुंचे तो वहां कजाखस्तान के विदेश मंत्री मुख्तार तिल्यूबर्दी के साथ द्विपक्षीय बैठक हुई। दोनों बैठकों में अफगानिस्तान का मुद्दा ही प्रमुखता से उठा। ये दोनों देश अफगानिस्तान के बिगड़ रहे हालात से सबसे ज्यादा ¨चतित भी हैं।

ताजिक विदेश मंत्री के बाद जयशंकर ने कहा है कि बदले माहौल में भारत-ताजिकिस्तान के रणनीतिक रिश्ते पहले से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो गए हैं।

इसके बाद जयशंकर के नेतृत्व में भारतीय दल की राष्ट्रपति घनी व उनके सहयोगियों के बीच ताशकंद में अहम बातचीत हुई है। इस बैठक के कुछ ही देर बार जयशंकर की अमेरिकी राष्ट्रपति की होमलैंड सिक्यूरिटी सलाहकार लिज शेरवुड रैंडाल और अफगान शांति वार्ता पर अमेरिकी प्रतिनिधि खलीलजाद के साथ एक संयुक्त बैठक हुई है। यह पिछले कुछ दिनों में खलीलजाद व अमेरिकी टीम के साथ भारतीय विदेश मंत्री की दूसरी बैठक है।

इन सभी बैठकों में होने वाली मंत्रणा के बारे में विदेश मंत्रालय की तरफ से आधिकारिक तौर पर कुछ नहीं बताया गया है लेकिन इससे साफ है कि भारत 20 वर्ष पहले की स्थिति नहीं दोहराना चाहता जब अफगानिस्तान पर पाकिस्तान के समर्थन से तालिबानियों का कब्जा हो गया और कोई भी देश कुछ नहीं कर सका।

विदेश मंत्री ने बुधवार को शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक में जो तीन सूत्रीय फार्मूला पेश किया है उसका मकसद यही है कि सभी संबंधित देश एक उग्रवाद समर्थक तालिबान के खतरे को समझ सके।

अफगानिस्तान को लेकर दूसरे देशों के बीच भी कई स्तरों पर बातचीत चल रही है। स्वयं राष्ट्रपति घनी ताशकंद में शुक्रवार को होने वाली कनेक्टिविटी समिट में हिस्सा लेने के लिए पहुंचे हैं। वह अपने सभी पड़ोसी देशों के प्रमुखों से मिल कर तालिबान को शांति वार्ता के लिए तैयार करने के लिए कह रहे हैं। शुक्रवार को होने वाली बैठक का विषय वैसे तो सेंट्रल व साउथ एशियाई क्षेत्र में कनेक्टिविटी परियोजना के भविष्य रखा गया है लेकिन अनौपचारिक तौर पर इसमें अफगानिस्तान के हालात पर ही चर्चाएं होने वाली हैं। पाकिस्तान सरकार इसको बहुत महत्व दे रही है।

पीएम इमरान खान, विदेश मंत्री शाह मेहमुद कुरैशी इसमें हिस्सा लेंगे। पाकिस्तान यह बताने की कोशिश कर रहा है कि तालिबान के आने के बावजूद अफगानिस्तान से गुजरने वाली कनेक्टिविटी परियोजनाओं को कोई खतरा नहीं है। दूसरी तरफ भारत समेत दूसरे मध्य एशियाई देश तालिबान की बढ़ती ताकत को लेकर आशंकित हैं। भारत की कनेक्टिविटी परियोजना जो ईरान के चाबहार से जुड़ा है, अफगानिस्तान की अस्थिरता उसको भी प्रभावित करेगी। इस बैठक में अमेरिका, यूरोप, चीन, रूस की तरफ से भी महत्वपूर्ण नेताओं को हिस्सा लेने के लिए भेजा गया है।

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