06 June, 2026 (Saturday)

वाराणसी में 28 फरवरी 2026 को चिता की राख से होली, मसान होली का रहस्य जानकर रह जाएंगे हैरान

होली रंगों का त्योहार है लेकिन काशी में चिता की राख से होली खेली जाती है. इसे मसाने की होली कहते है. इस साल मसाने की होली 28 फरवरी 2026 को है. वारणसी में रंगभरी एकादशी पर भोलेनाथ और माता पार्वती रंगों से होली खेलते हैं.

वाराणसी में रंगभरी एकादशी के दिन भोलेनाथ और माता पार्वती रंगों से होली खेलते हैं. इसके अगले दिन, यानी फाल्गुन शुक्ल द्वादशी को भगवान महाश्मशानाथ (भोलेनाथ) अपने गणों भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष, गंधर्व और राक्षसों- के साथ भस्म की होली खेलते हैं.

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस परंपरा का उल्लेख शिवपुराण और दुर्गा सप्तशती में भी मिलता है. मसान की होली जीवन की नश्वरता, वैराग्य और शिव तत्व के गहरे आध्यात्मिक अर्थ को दर्शाती है.

मृत्यु पर विजय और आत्मा की अमरता का प्रतीक
मसान होली वाराणसी (काशी) में मनाई जाने वाली एक अनोखी परमपरा और आध्यात्मिक होली है. इसे राख का त्योहार भी कहा जाता है. मसान’ का अर्थ होता है श्मशान (जहाँ शव दाह होता है) और ‘मसान होली’ का अर्थ श्मशान की होली है, यहां न रंग, न पिचकारी,न गोपी, न ग्वाले चारों तरफ भूत-पिशाच की भेष में आए भोलेनाथ के भक्त चिता की राख से होली खेलते हैं. ये त्योहार मोह माया के जाल से मुक्त होना भी दर्शाता है क्योंकि अंत में व्यक्ति को राख ही होना है. यह उत्सव मृत्यु पर विजय और जीवन-मृत्यु के चक्र से परे आत्मा की अमरता का प्रतीक है.

महिलाओं का इस होली में आना मना
मसान होली को भस्म होली और भभूत होली के नाम से भी जाना जाता है. वाराणसी (काशी) में मनाई जाने वाली यह परंपरा विश्व-प्रसिद्ध है, जिसे देखने के लिए देश ही नहीं, विदेशों से भी श्रद्धालु और पर्यटक पहुंचते हैं. इस अनोखी होली में साधु-संत, आम श्रद्धालु और अघोरी सम्मिलित होते हैं, जबकि परंपरा के अनुसार इस आयोजन में महिलाओं की भागीदारी नहीं होती.

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार मसान होली की परंपरा की शुरुआत भगवान शिव से जुड़ी मानी जाती है. कथा के अनुसार रंगभरी एकादशी के दिन विवाह के बाद पहली बार भोलेनाथ वाराणसी पहुंचे थे. इस अवसर पर माता पार्वती के स्वागत में गुलाल उड़ाया गया और इसी प्रसंग से रंगों की होली की परंपरा शुरू हुई.

अपने गणों के साथ गुलाल से होली खेली थी
मान्यता है कि शिवजी ने रंगभरी एकादशी के दिन अपने गणों के साथ गुलाल से होली खेली थी लेकिन उस दिन भूत-प्रेत, यक्ष, गंधर्वाों के साथ होली नहीं खेली गई. इसी वजह से रंगभरी एकादशी के अगले दिन मसाने की होली खेलने की परंपरा मानी जाती है.

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