इमोशंस में उलझी कोर्ट रूम ड्रामा, अक्षय खन्ना के तेवर ने बचाई लाज, नहीं चला सनी देओल का हुकुम का इक्का | Ikka Review
सनी देओल और अक्षय खन्ना की फिल्म ‘इक्का’ आज ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज हो गई है। फिल्म की कहानी और कलाकारों का अभिनय कैसा है, ये जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।
फिल्म रिव्यू:
इक्का
स्टार रेटिंग
2.5/5
पर्दे पर:
10/07/2026
डायरेक्टर:
सिद्धार्थ पी मल्होत्रा
शैली:
कोर्टरूम ड्रामा
सनी देओल और अक्षय खन्ना स्टारर फिल्म ‘इक्का’ अब ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर दर्शकों के लिए उपलब्ध हो चुकी है। अगर आप इस वीकेंड किसी कोर्ट रूम ड्रामा को देखने का मन बना रहे हैं तो इस फिल्म को अपनी वॉचलिस्ट में शामिल करने से पहले यह रिव्यू जरूर पढ़ें। शानदार और मंझे हुए कलाकारों की टोली से सजी यह फिल्म आपको कहीं-कहीं बहुत ज्यादा इमोशनल करेगी, कुछ मौकों पर अपनी कहानी में उलझाएगी, लेकिन अगर आप एक कड़क और रोंगटे खड़े कर देने वाले कोर्ट रूम ड्रामा की उम्मीद कर रहे हैं तो यह फिल्म आपको उस स्तर का पूरा मजा देने में थोड़ी नाकाम साबित होती है। आइए विस्तार से जानते हैं कि कहानी, अभिनय और निर्देशन के मोर्चे पर यह फिल्म कैसी उतरी है।
कहानी की शुरुआत और प्लॉट
फिल्म ‘इक्का’ की कहानी का ताना-बाना मुख्य रूप से इमोशंस, एक पिता की लाचारी और न्याय प्रणाली के इर्द-गिर्द बुना गया है। कहानी की शुरुआत में अर्जुन (सनी देओल) का एक बहुत ही शानदार और प्रभावशाली इंट्रोडक्शन दिया जाता है। अर्जुन शहर का एक बहुत बड़ा, नामी और बेहद कामयाब लॉयर है, जिसे कानूनी दुनिया में लोग ‘इक्का’ के नाम से जानते हैं। वह एक लॉ कॉलेज में बतौर गेस्ट लेक्चरर पहुंचता है, जहां से उसके रुतबे का अंदाजा होता है। इसी के समानांतर अर्जुन के खुशहाल परिवार से दर्शकों का परिचय कराया जाता है। उसकी पत्नी अवंतिका (दिया मिर्जा) और उसकी बेटी समारा, दोनों अर्जुन की दुनिया का केंद्र हैं। समारा एक होनहार एथलीट है और नेशनल लेवल स्विमर बनने की जी-तोड़ तैयारी कर रही है। सब कुछ बहुत सामान्य और खुशहाल चल रहा होता है, लेकिन तभी कहानी में एक मनहूस मोड़ आता है। एक अहम स्विमिंग प्रतियोगिता के दौरान अचानक समारा की नाक से खून बहने लगता है। अस्पताल में जांच के बाद जो सच सामने आता है, वह अर्जुन और अवंतिका की दुनिया उजाड़ देता है, समारा को एक गंभीर किस्म का कैंसर है।
एक तरफ अर्जुन अपनी बेटी की इस जानलेवा बीमारी की पर्सनल प्रॉब्लम से बुरी तरह टूट रहा होता है और निराशा के भंवर में गिरता जा रहा होता है, वहीं दूसरी तरफ उसके पेशेवर जीवन में एक हाई प्रोफाइल अटेम्प्ट टू मर्डर का केस आता है। अर्जुन शुरुआत में इस केस को लड़ने से साफ इनकार कर देता है। उसके इस केस को ठुकराने की वजह बिल्कुल साफ है, वह अपने उसूलों का पक्का इंसान है। अर्जुन एक ऐसा वकील है जो अपने जमीर से कभी समझौता नहीं करता और किसी भी गुनहगार को कानून के फंदे से बचाने के लिए कभी अदालत में खड़ा नहीं होता, लेकिन तकदीर और बेटी की बीमारी अर्जुन को उसी उसूल से समझौता करने पर मजबूर कर देती है।
कहानी के शुरुआती हिस्से में ही एक ऐसा जबरदस्त मोड़ आता है जो दर्शकों को चौंका कर रख देगा। जिस आरोपी का केस लड़ने से अर्जुन बचना चाहता था, लेकिन वह उसी का केस लड़ने के लिए मजबूर हो जाता है। दरअसल यह हाई-प्रोफाइल आरोपी शौर्य (अक्षय खन्ना) कोई और नहीं, बल्कि समारा (अर्जुन की बेटी) का असल बायोलॉजिकल फादर है। मेडिकल रिपोर्ट्स के अनुसार केवल शौर्य के बोन मैरो ट्रांसप्लांट से ही समारा की जान बचाई जा सकती है और उसका इलाज संभव है। अब अर्जुन नाम के इस दिग्गज वकील के सामने जिंदगी की सबसे बड़ी और दोहरी चुनौती खड़ी है। एक ओर उसे अपनी मरती हुई बेटी को मौत के मुंह से खींचकर वापस लाना है, जिसके लिए आरोपी शौर्य का बाहर रहना जरूरी है, और दूसरी ओर एक सच्चे वकील के तौर पर उसे उस गुनहगार को उसके किए की सजा भी दिलानी है। इस नामुमकिन सी दिखने वाली स्थिति में अर्जुन कौन सा ‘हुकुम का इक्का’ चलेगा और कैसे इस चक्रव्यूह से बाहर निकलेगा, यह जानने के लिए आपको कहानी के क्लाइमेक्स तक का सफर तय करना पड़ता है।
पटकथा और लेखन की कमियां
कहने को तो ‘इक्का’ एक कोर्ट रूम ड्रामा है, लेकिन 2 घंटे 20 मिनट की इस कहानी में सस्पेंस और कोर्ट की तीखी बहस की तुलना में पारिवारिक इमोशन और मेलोड्रामा कहीं ज्यादा हावी रहता है। कहानी अपने फ्लो के साथ आगे बढ़ती है, लेकिन फिल्म देखते हुए यह पहले से ही समझ आने लगता है कि आखिर में जाकर मामला पूरी तरह से पलटेगा। यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं होता कि अर्जुन अपनी बेटी की जान बचाने के साथ-साथ विक्टिम को भी इंसाफ जरूर दिलाएगा। बॉलीवुड की कई पुरानी फिल्मों की तरह यह प्लॉट भी पहले से प्रायोजित सा महसूस होता है। हालांकि फिल्म की 2 घंटे 20 मिनट की लंबाई आपको बोर तो नहीं करती, लेकिन यह किसी नएपन या फ्रेशनेस का अहसास भी नहीं कराती।
फिल्म के स्क्रीनप्ले की सबसे बड़ी खामी कोर्ट रूम के अंदर नजर आती है। कहानी में विक्टिम की वकील या पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (तिलोत्तमा शोम) को बहुत ही कमजोर दिखाया गया है। उन्हें एक ऐसी वकील के रूप में पेश किया गया है जो कोर्ट में बिना किसी ठोस तैयारी, बिना जांचे-परखे और बिना किसी बैकग्राउंड स्टडी के बहस करने आ जाती है। उन्हें केस में कई लूप होल नजर तो आ रहे हैं, लेकिन वह उन्हें खोजने के लिए कोई मेहनत करती नहीं दिखतीं। एक पब्लिक प्रॉसिक्यूटर होने के नाते उनके पास पूरी पुलिस फोर्स और जांच एजेंसियों का सपोर्ट होता है, लेकिन फिल्म में पुलिस टीम और प्रॉसिक्यूशन की टीम को एकदम नकारा और दिशाहीन दिखाया गया है। दूसरी तरफ, डिफेंस लॉयर (अर्जुन) को बहुत आसानी से कोर्ट में हावी होते और केस जीतते हुए दिखाया गया है। ऐसा पोर्ट्रेट किया गया है मानो पब्लिक प्रॉसिक्यूटर पहले से ही यह मानकर बैठी है कि उसे यह केस हारना ही है, और यहां तक कि अदालत का जज भी अर्जुन की भारी-भरकम छवि से पूरी तरह इन्फ्लुएंस नजर आता है।
भारतीय कहानियों में अक्सर वकीलों के इमोशंस को दिखाया जाता है और अमूमन फिल्म का हीरो पीड़ित का केस लड़ता है। लेकिन यहां हीरो एक आरोपी का केस लड़ रहा है। यह एक प्रोफेशनल केस से ज्यादा अर्जुन का पर्सनल केस बन गया है, इसीलिए राइटर्स ने इसमें भावनाओं को बहुत ज्यादा झोंक दिया है।
अल्थिया कौशल और मयंक तिवारी को इसके स्क्रीनप्ले पर बहुत ज्यादा और बेहतर काम करने की जरूरत थी। फिल्म की पूरी कहानी और सस्पेंस आखिरी के मात्र 10 मिनट में अचानक पलट जाता है, जो दर्शक के गले आसानी से नहीं उतरेगा। पूरी फिल्म में अर्जुन को एक हताश, लाचार और परेशान बाप के रूप में दिखाया गया है, लेकिन क्लाइमेक्स में अचानक पता चलता है कि वह तो शुरुआत से ही सारी तैयारी कर रहा था और बस बोन मैरो मिलने का इंतजार कर रहा था। अगर यही बात स्क्रीनप्ले में पहले से थोड़ी-थोड़ी दिखाई जाती कि अर्जुन लाचार नहीं है, बल्कि गुपचुप तरीके से सबूत और गवाह इकट्ठे कर रहा है तो आखिरी का ट्विस्ट बहुत अच्छी तरह से स्टैब्लिश हो जाता और ज्यादा प्रभावशाली लगता। आज के समय में भारत के दर्शकों ने ‘जॉली एलएलबी’, ‘क्रिमिनल जस्टिस’ और ‘सेक्शन 375’ जैसे बेहद शानदार, कसे हुए और रियलिस्टिक कोर्ट रूम ड्रामा देख रखे हैं। उन बेहतरीन शोज और फिल्मों के सामने ‘इक्का’ की कहानी काफी सुस्त और फीकी पड़ जाती है।
निर्देशन
फिल्म का निर्देशन सिद्धार्थ पी मल्होत्रा ने किया है, जो इससे पहले ‘काफिर’, ‘हिचकी’ और ‘डायल 100’ जैसी बेहतरीन और संवेदनशील फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं। इस बार भी उनका निर्देशन ही वह अकेला तत्व है जो अल्थिया और मयंक के कमजोर लेखन को जैसे-तैसे संभाल ले जाता है। सिद्धार्थ ने फिल्म को बिखरने से रोका है। हालांकि कई दृश्यों में वह भी सनी देओल यानी अर्जुन की गहरी खामोशी को पूरी तरह से जस्टिफाई नहीं कर पाए हैं। कहानी के प्रेडिक्टेबल होने के बावजूद, निर्देशक ने इसे इमोशंस के धागे से कसकर बांधने की पूरी कोशिश की है। सच कहा जाए तो इस फिल्म का यह इमोशनल कनेक्ट ही इसकी सबसे बड़ी ताकत भी है और सबसे बड़ी कमजोरी भी।
अभिनय और किरदार
एक्टिंग के मोर्चे पर ‘इक्का’ एक सजी-धजी फिल्म है, जहां अनुभवी कलाकारों ने अपना पूरा जोर लगाया है। बिना किसी शक के अक्षय खन्ना इस फिल्म और इसकी पूरी कास्टिंग की सबसे मजबूत कड़ी हैं। आरोपी शौर्य के किरदार में वह बिल्कुल परफेक्ट लगे हैं। एक रौबदार, बिगड़ैल, घमंडी और अमीर बाप की औलाद के रोल में अक्षय खूब जंच रहे हैं। उनके बात करने के अंदाज में जो एक रूखापन है और भयंकर गलती करने के बावजूद जो चौड़ में रहने वाला मिजाज है, वह स्क्रीन पर बिल्कुल साफ और असरदार तरीके से नजर आता है।
सनी फिल्म के मुख्य हीरो हैं और सालों का उनका सिनेमाई अनुभव उनकी एक्टिंग में साफ झलकता है। एक परफेक्ट पिता और अपनी पत्नी से प्यार करने वाले पति के रूप में वह आपको बहुत पसंद आएंगे। वे अपनी आंखों और चेहरे से एक पिता का दर्द बखूबी बयां करते हैं। लेकिन, अगर आप इस फिल्म में ‘दामिनी’ वाले उस पुराने, गरजने वाले सनी देओल की झलक पाने सिनेमाघर या नेटफ्लिक्स पर गए हैं, तो आपको घोर निराशा होगी। एक जोरदार और आक्रामक वकील के तौर पर वह थोड़े कमजोर नजर आते हैं। कोर्ट रूम वाले तीखे दांव-पेंच, कड़क सवाल-जवाब, लंबी-लंबी बहसें और तगड़े मोनोलॉग इस बार उनके हिस्से में नहीं आए हैं। देखा जाए तो इसमें सनी देओल की कोई गलती नहीं है, बल्कि यह पूरी तरह से राइटर का फॉल्ट है। सनी देओल की जो असल काबिलियत है उनकी गरजती हुई आवाज और स्क्रीन प्रेजेंस, उसका इस्तेमाल फिल्म में काफी कम किया गया है।
अवंतिका के रोल में दिया मिर्जा को स्क्रीन स्पेस भले ही थोड़ा कम मिला है, लेकिन जितनी भी देर वह स्क्रीन पर नजर आई हैं, उन्होंने अपनी शानदार और सधी हुई एक्टिंग से दर्शकों को प्रभावित किया है। सच का साथ देने और अपनी मरती हुई बेटी के मोह के बीच बुरी तरह उलझी हुई एक बेबस मां के रूप में दिया मिर्जा का अभिनय वाकई काबिले तारीफ है।
शौर्य की पत्नी के रोल में संजीदा शेख को भी सीमित समय मिला है, लेकिन अपने पति को कानून से बचाने की जद्दोजहद में लगी एक महिला के किरदार में वह काफी जंच रही हैं और अपने रोल के साथ पूरा न्याय करती हैं।
अंत में बात करते हैं तिलोत्तमा शोम की। वह कमाल की और बेहद प्रतिभाशाली एक्टर हैं। एक लूज और खराब तरीके से लिखे गए किरदार में भी उन्होंने अपनी एक्टिंग की गहरी छाप छोड़ी है। एक बंगाली महिला पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के रोल में उनकी मेहनत दिखती है और वह आपको अच्छी भी लगेंगी। लेकिन अगर राइटर्स उनके किरदार को थोड़ा और दमदार बनाते, उसे और ज्यादा रिसर्च और धार देते तो यकीनन इस कोर्ट रूम ड्रामे का मजा दोगुना हो जाता।
तकनीकी पक्ष
फिल्म के तकनीकी पहलुओं की बात करें तो सिनेमैटोग्राफी और एडिटिंग को बिलकुल भी दोष नहीं दिया जा सकता। कैमरा वर्क बहुत ही उम्दा है। फिल्म में किरदारों के इमोशन्स को कैप्चर करते क्लोज-अप सीन्स, लोकेशन को दिखाते एस्टेब्लिशिंग शॉट्स और कोर्ट रूम के अंदर लिए गए लॉन्ग शॉट्स शानदार तरीके से फिल्माए गए हैं, जो दृश्य अनुभव को बढ़ाते हैं। इसके साथ ही फिल्म की एडिटिंग भी काफी कसी हुई है और यही बड़ी वजह है कि 2 घंटे 20 मिनट की लंबाई होने के बावजूद कहानी दर्शकों को बोर नहीं होने देती और स्क्रीन से बांधे रखती है।
कहां रह गई कमी?
दिए गए रिव्यू के अनुसार फिल्म ‘इक्का’ एक कड़क और रोंगटे खड़े कर देने वाले कोर्ट रूम ड्रामा के रूप में प्रभावित करने में नाकाम साबित होती है। फिल्म की पटकथा काफी कमजोर और पहले से अनुमान लगाने योग्य है, जिसमें सस्पेंस की जगह पारिवारिक मेलोड्रामा ज्यादा हावी रहता है। सबसे बड़ी कमी कोर्ट रूम के दृश्यों में दिखती है, जहां तिलोत्तमा शोम द्वारा अभिनीत पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के किरदार को बिना तैयारी के और बेहद नकारा दिखाया गया है, जिससे कानूनी बहस बेहद सतही लगती है। इसके अलावा क्लाइमेक्स का अचानक बदला ट्विस्ट दर्शकों के गले नहीं उतरता। ‘दामिनी’ जैसी फिल्मों के विपरीत, इसमें सनी देओल की गरजती आवाज और आक्रामक वकीलों वाले तीखे दांव-पेंच व तगड़े मोनोलॉग गायब हैं, जो दर्शकों को निराश करते हैं।
वर्डिक्ट
कुल मिलाकर ‘इक्का’ एक ऐसी फिल्म है जो अपनी मजबूत स्टार कास्ट और इमोशनल हुक के सहारे चलती है। लेकिन, अगर आप एक विशुद्ध और बेहतरीन कोर्ट रूम ड्रामा की चाहत लेकर इसे देखने बैठ रहे हैं और आप सिर्फ अच्छी एक्टिंग और फिल्मी मसाले के अलावा कहानी की गहराई और कोर्ट रूम के लीगल दांव-पेंच में दम खोज रहे हैं तो यह फिल्म आपको थोड़ा निराश जरूर करेगी। क्योंकि कानूनी बहस के मामले में यह फिल्म बहुत सतही रह जाती है। हालांकि इसके उलट अगर आप सिर्फ मनोरंजन के लिए एक फिल्म देखना चाहते हैं, जहां आपको पारिवारिक भावनाएं, एक पिता का संघर्ष और दिग्गज कलाकारों का बेहतरीन अभिनय देखने को मिले तो आप इस फिल्म को कम से कम एक बार तो जरूर देख ही सकते हैं। अक्षय खन्ना का एटीट्यूड और सनी देओल का इमोशनल अवतार आपको एक बार देखने के लिए पर्याप्त कारण देता है।
