रेगिस्तान की सूखी रेत में उम्मीद की नमी तलाशती ‘ओमलो’, समाज को झकझोर कर रख देगी कहानी |
‘ओमलो’ राजस्थान की पृष्ठभूमि पर आधारित एक बेहद मार्मिक फिल्म है, जो घरेलू हिंसा, पितृसत्ता और पीढ़ियों के दर्द को उजागर करती है। धीमी पटकथा के बावजूद, शानदार अभिनय और संवेदनशील निर्देशन इसे समाज का एक यथार्थवादी आईना बनाते हैं।
आज के दौर में जब डिजिटल प्लेटफॉर्म्स और सिनेमाघरों में भव्य सेट, एक्शन से भरपूर थ्रिलर और बड़े बजट की मसाला फिल्मों का बोलबाला है, तब कोई ऐसी फिल्म खोजना किसी ताजी हवा के झोंके से कम नहीं है, जो जीवन की नग्न और खुरदरी सच्चाइयों को बिना किसी बनावट के पर्दे पर पेश करे। हाल ही में ‘वेव्स ओटीटी’ पर रिलीज हुई हिंदी फिल्म ‘ओमलो’ एक ऐसी ही साहसिक सिनेमाई कोशिश है। निर्देशक सोनू रणदीप चौधरी ने इस फिल्म के जरिए एक ऐसी दुनिया का दरवाजा खोला है, जिसे समाज का एक बड़ा हिस्सा या तो अनदेखा कर देता है या उस पर बात करने से कतराता है।
घरेलू हिंसा, महिला उत्पीड़न, और पीढ़ियों से चली आ रही पितृसत्तात्मक जंजीरों जैसे संवेदनशील विषयों को यह फिल्म केवल एक मुद्दे की तरह नहीं, बल्कि एक जीते-जागते, सांस लेते हुए दर्द की तरह पेश करती है। ‘ओमलो’ कोई ऐसी कहानी नहीं है जो आपको सस्पेंस से बांधे रखेगी, बल्कि यह एक ऐसा अनुभव है जो धीरे-धीरे आपके भीतर उतरता है और आपको यह सोचने पर विवश कर देता है कि क्या वास्तव में समय बदलने के साथ हमारे समाज की बुनियादी सोच में कोई बदलाव आया है या हम आज भी पुरानी मानसिक बेड़ियों में जकड़े हुए हैं।
कहानी और ताना-बाना
फिल्म की कहानी आपको राजस्थान के एक ऐसे दूरदराज और रेतीले गांव में ले जाती है, जहाँ जिंदगी उतनी ही सूखी और संघर्षपूर्ण है, जितनी वहां की तपती रेत। कहानी के केंद्र में है सावित्री, एक ऐसी महिला जिसके कंधों पर गरीबी, परिवार और एक शराबी पति का बोझ है। वह चिलचिलाती धूप में पसीना बहाकर मजदूरी करती है, ताकि उसके बच्चों का पेट पल सके। सावित्री की दिनचर्या में कोई रोमांच नहीं है, बल्कि एक ऐसा अंतहीन संघर्ष है जिसे वह अपनी नियति मान चुकी है।
कहानी की शुरुआत में ही एक बेहद शक्तिशाली और प्रतीकात्मक दृश्य दिखाया गया है, एक खुले रेगिस्तान में एक ऊंट के पैरों से बंधी रस्सियां खोल दी जाती हैं, उसे आजाद कर दिया जाता है। लेकिन वह ऊंट अपनी उस नई मिली आजादी से इतना अनजान और डरा हुआ है कि वह समझ ही नहीं पाता कि अब उसे क्या करना है। वह अपनी जगह पर ठिठका रहता है। यह अकेला दृश्य पूरी फिल्म की आत्मा को परिभाषित कर देता है। यह सिर्फ एक जानवर की नहीं, बल्कि उन तमाम महिलाओं और शोषित वर्गों की कहानी है जो पीढ़ियों से चली आ रही मानसिक और शारीरिक गुलामी के इतने आदी हो चुके हैं कि उनके लिए आजादी का मतलब ही बेमानी हो गया है।
सावित्री की जिंदगी में भूचाल तब आता है जब उसके ससुर की अचानक मृत्यु हो जाती है। घर के एक बुजुर्ग के जाने के बाद परिवार की आर्थिक स्थिति और चरमरा जाती है। सामाजिक परंपराओं का दबाव, पैसे की तंगी और एक गैर-जिम्मेदार, हिंसक पति के साथ जीवन बिताने की मजबूरी सावित्री को भीतर तक तोड़ती है। लेकिन इस पूरे पारिवारिक क्लेश और हिंसा का एक मौन गवाह भी है, छोटा बच्चा ‘ओमलो’। ओमलो अपनी मासूम और डरी हुई आंखों से इस पूरी दमघोंटू व्यवस्था को देखता है। वह अपनी मां के दर्द को समझता है, लेकिन अपने छोटे हाथों से उस दर्द को मिटा नहीं सकता। यह कहानी उसी ओमलो की नजर से समाज के सबसे कड़वे सच को परत-दर-परत उधेड़ती है।
निर्देशन का नजरिया
सोनू रणदीप चौधरी ने इस फिल्म के जरिए यह साबित किया है कि वे एक परिपक्व कहानीकार हैं। बतौर निर्देशक उनका सबसे बड़ा कौशल इस बात में झलकता है कि उन्होंने कहानी को कहीं भी ओवर-ड्रामेटिक या मेलोड्रामैटिक नहीं होने दिया है। अक्सर ऐसी फिल्मों में निर्देशकों को भावनाओं को भुनाने के लिए चीख-पुकार और आंसुओं का सहारा लेते देखा जाता है, लेकिन सोनू ने खामोशी को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया है।
उन्होंने राजस्थान के ग्रामीण जीवन की सादगी, वहां की बोली, पहनावे और दैनिक जीवन की जद्दोजहद को अत्यधिक प्रामाणिकता के साथ पर्दे पर उकेरा है। फिल्म में कोई भी दृश्य ऐसा नहीं लगता कि उसे किसी सेट पर कृत्रिम रोशनी में शूट किया गया हो; सब कुछ इतना जीवंत है मानो किसी ने एक आम राजस्थानी परिवार के आंगन में चुपचाप कैमरा रख दिया हो। निर्देशक यह बखूबी जानते हैं कि हिंसा सिर्फ वह नहीं है जो शरीर पर घाव दे, बल्कि वह घुटन भी एक हिंसा है जो इंसान की आत्मा को मार देती है और इसी घुटन को उन्होंने बहुत ही सधे हुए तरीके से निर्देशित किया है।
अभिनय और किरदार
अगर ‘ओमलो’ अपनी बात दर्शकों तक पहुंचाने में सफल होती है, तो इसका बहुत बड़ा श्रेय इसके कलाकारों के यथार्थवादी अभिनय को जाता है। सावित्री के रूप में सोनाली शर्मिष्ठा ने अपने करियर का यकीनन सबसे बेहतरीन और चुनौतीपूर्ण काम किया है। उनके चेहरे की झुर्रियां, थकी हुई आंखें और शरीर की भाषा चीख-चीख कर उनके भीतर का दर्द बयां करती हैं। उन्होंने अपने किरदार में ग्लैमराइज़ेशन को बिल्कुल भी हावी नहीं होने दिया है, वह सच में एक ऐसी राजस्थानी मजदूरन लगती हैं जिसकी उम्मीदें जिंदगी की जद्दोजहद में कहीं खो गई हैं।
छोटे बच्चे ‘ओमलो’ के किरदार में शम्भो महाजन का काम दिल छू लेने वाला है। इस बाल कलाकार के पास संवाद बहुत कम हैं, लेकिन उसकी आंखें दर्शकों से लगातार संवाद करती हैं। जब वह अपनी मां को पिटते हुए या रोते हुए देखता है, तो उसके चेहरे पर जो बेबसी और गुस्सा उभरता है, वह सीधे दर्शक के दिल पर वार करता है। शराबी पति के रूप में खुद निर्देशक सोनू रणदीप चौधरी ने भी बेहतरीन काम किया है। उन्होंने अपने किरदार को एक ठेठ खलनायक बनाने के बजाय समाज की उस पितृसत्तात्मक उपज के रूप में पेश किया है, जो खुद अपनी कुंठाओं का शिकार है। इसके अलावा वंदना गुप्ता, देवा शर्मा और महेश जिलोवा ने अपने-अपने सीमित लेकिन महत्वपूर्ण किरदारों में पूरी ईमानदारी से न्याय किया है।
तकनीकी पहलू
एक सच्ची पेशकश वाली फिल्म की सफलता में उसके तकनीकी पहलुओं का बहुत बड़ा हाथ होता है, विशेषकर तब जब कहानी एक विशेष भौगोलिक पृष्ठभूमि पर आधारित हो। सिनेमैटोग्राफर विल्सन रैबिन्से का कैमरा वर्क शानदार है। बीकानेर और श्री डूंगरगढ़ की वास्तविक लोकेशंस पर की गई शूटिंग ने फिल्म को एक अलग ही स्तर की भव्यता और खालीपन प्रदान किया है। कैमरा रेगिस्तान के विशाल, अंतहीन और सूखे परिदृश्यों को उस परिवार के भावनात्मक खालीपन के साथ बहुत ही कलात्मक ढंग से जोड़ता है।
संगीत की बात करें तो राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता गाजी खान बरना और भुवन आहूजा ने राजस्थानी लोक धुनों का इस्तेमाल बेहद बारीकी से किया है। फिल्म में गाने कहानी की गति को तोड़ते नहीं हैं, बल्कि किरदारों की आंतरिक उथल-पुथल को स्वर देते हैं। देवेंद्र भोमे का बैकग्राउंड स्कोर दृश्यों की खामोशी को हावी होने देता है और केवल वहीं अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है जहाँ भावनात्मक गहराई को उभारने की सख्त जरूरत होती है।
क्या खटका?
फिल्म की कहानी और नीयत बहुत नेक है, लेकिन सिनेमाई अनुभव के तौर पर इसमें कुछ ऐसी कमियां हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी बहुत ही धीमी पटकथा है। कहानी अपने विषयों को स्थापित करने में इतना समय लेती है कि कई बार दर्शक का धैर्य जवाब देने लगता है। विशेषकर फिल्म के दूसरे भाग में, एक ही तरह के दुख और प्रताड़ना वाले दृश्यों का बार-बार दोहराव होता है, जो फिल्म को थोड़ा बोझिल बना देता है।
इसके अलावा फिल्म का संपादन और अधिक चुस्त हो सकता था। कई दृश्य बिना किसी ठोस कारण के लंबे खींचे गए हैं। फिल्म किसी स्पष्ट समाधान या तेज गति वाले क्लाइमैक्स की तरफ नहीं बढ़ती, बल्कि यह जीवन की तरह ही एक अनसुलझे मोड़ पर खड़ी रहती है। जो दर्शक एंटरटेनमेंट, फास्ट-पेस ड्रामा या एक मुकम्मल ‘हैप्पी एंडिंग’ की तलाश में इस फिल्म को देखेंगे, उन्हें यह फिल्म निराश कर सकती है। यह आम दर्शकों की फिल्म कम और फेस्टिवल सर्किट या आर्ट-हाउस सिनेमा पसंद करने वालों की फिल्म ज्यादा लगती है।
वर्डिक्ट
‘ओमलो’ कोई ऐसी फिल्म नहीं है जिसे आप पॉपकॉर्न खाते हुए मनोरंजन के लिए देखें। यह एक ऐसी कलाकृति है जो आपको झकझोरती है, सवाल पूछती है और पीढ़ियों से चले आ रहे उस जहरीले चक्र की तरफ उंगली उठाती है जो आज भी हमारे समाज में मौजूद है। यह फिल्म बताती है कि बचपन में देखी गई घरेलू हिंसा किस तरह आने वाली पीढ़ी के अवचेतन मन में बस जाती है। ‘ओमलो’ उस मासूमियत के टूटने और फिर एक नई उम्मीद के जागने का प्रतीक है।
अगर आप धीमी गति से चलने वाले, यथार्थवादी और गंभीर मुद्दों पर बने सिनेमा के मुरीद हैं और सिनेमा को समाज का आईना मानते हैं तो आपको सोनू रणदीप चौधरी की इस कोशिश को एक मौका जरूर देना चाहिए। अपनी कुछ तकनीकी और लेखनी की कमियों के बावजूद, यह फिल्म एक मजबूत प्रभाव छोड़ने में सफल रहती है।
