11 March, 2026 (Wednesday)

सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी: क्या हमारी याददाश्त इतनी कमजोर हो गई? (लेखिका- तमन्ना रिज़वी/ ईएमएस)

एक सवाल जो देश को झकझोरना चाहिए
भारत जैसे विशाल लोकतांत्रिक देश में विचारों की स्वतंत्रता, नागरिक अधिकारों की सुरक्षा और असहमति की आवाज़ को सम्मान देना हमेशा इसकी पहचान रही है। महात्मा गांधी की अहिंसा जिसने दुनिया को रास्ता दिखाया, आज उसी शांतिप्रिय देश में सोनम वांगचुक जैसे पर्यावरणविद्, शिक्षा सुधारक और सामाजिक मार्गदर्शक जेल में हैं। विडंबना यह है कि देश का एक बड़ा वर्ग उन्हें भूलने लगा है। यह स्थिति हमें भीतर तक झकझोरती है। सवाल है क्या सच बोलने वालों, प्रकृति की रक्षा करने वालों और समाज को रास्ता दिखाने वालों को भूल जाना हमारी नई आदत बन गई है?
दरअसल सोनम वांगचुक के बारे में कहा जाता है, कि वे सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि वे एक संपूर्ण विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। आइस स्तूप जैसी नवोन्मेषी तकनीक जिसने हिमालय के सूखे इलाकों में पानी की समस्या को हल किया, और स्कमॉल (एसईसीएमओएल) जैसा वैकल्पिक शिक्षा मॉडल दिया, जिसने हजारों युवाओं को नई राह दिखाई। उन पर लगे तमाम आरोपों से हटकर ये सब उनके योगदान की प्रमुख मिसालें हैं। कहने में हर्ज नहीं कि उनका हर कदम शांतिपूर्ण रहा, वैज्ञानिक चेतना से भरा रहा और पहाड़ों की रक्षा के संघर्ष से जुड़ा रहा। ऐसे व्यक्ति का जेल चले जाना भारतियों के जेहन में कई सवाल खड़े करता है। सबसे बड़ा सवाल यही है, कि शांतिपूर्ण ढंग से बड़े-बड़े बदलाव करने वाले इस व्यक्ति से आखिर किसे भय और डर हो सकता है? इसके लिए जहां लद्दाख की पृष्ठभूमि के पन्ने पलटने होंगे वहीं सोनम वांगचुक के मील का पत्थर साबित होने वाले ऐतिहासिक कार्यों पर भी नजर दौड़ाना होगी।
लद्दाख की लड़ाई: पहचान, जमीन और अस्तित्व की जंग
लद्दाख के लोग 2019 के बाद से लगातार अपनी चिंता व्यक्त कर रहे हैं। उनकी जमीन, संसाधन, रोजगार और सांस्कृतिक पहचान कहीं बाहरी ताकतों या कॉर्पोरेट हितों के हाथों न चली जाए। इसी के चलते वे संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। सोनम वांगचुक ने यह मांग शांतिपूर्वक, तार्किक और वैज्ञानिक आधार पर दुनिया के सामने रखी। कहा जाता है कि शांत और स्पष्ट आवाज़ें अक्सर सत्ता को असहज कर देती हैं। यही कारण है कि उन्हें कई बार रोका गया, नजरबंद किया गया और आखिरकार सितंबर 2025 में गिरफ्तार कर लिया गया।
संघर्ष और गिरफ्तारी
ऐसे में कहा जा रहा, कि यह संघर्ष सिर्फ वांगचुक का नहीं, हम सभी का है। यह मामला सिर्फ एक गिरफ्तारी या एक व्यक्ति का संघर्ष नहीं है। यह सवाल उठाता है, क्या हिमालय सुरक्षित रहेंगे? क्या जलवायु संकट से लड़ने वाले वैज्ञानिकों की आवाज़ को दबा दिया जाएगा? क्या लद्दाख के समुदाय अपनी पहचान बचा पाएंगे? क्या शांतिपूर्ण आंदोलन करना अपराध माना जाएगा? सोनम वांगचुक आज जेल के पीछे जरुर हैं, लेकिन उनका विचार लद्दाख के लोगों को आज भी उतना ही जीवंत नजर आ रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि उनके संदेश में आने वाली पीढ़ियों की चिंता है।
गिरफ्तारी का संदर्भ: प्रदर्शन, हिंसा और आरोप
सितंबर 2025 में लद्दाख में हुए बड़े प्रदर्शनों में स्थिति अचानक तनावपूर्ण हो गई और हिंसा भड़क उठी, जिसमें चार लोगों की मौत हुई। प्रशासन का दावा है कि वांगचुक के बयान उकसाने वाले थे, इसलिए उन्हें एनएसए के तहत हिरासत में लिया गया और लद्दाख से दूर जोधपुर सेंट्रल जेल भेज दिया गया। एनएसए एक ऐसा कानून है जिसमें किसी व्यक्ति को बिना ट्रायल लंबे समय तक कैद में रखा जा सकता है। इसी वजह से इस कार्रवाई की जनता द्वारा भारी आलोचना भी हुई। परिवार, समर्थकों और नागरिक अधिकार समूहों ने इसे मनमाना, असंवैधानिक और लोकतंत्र विरोधी कदम बताया। वहीं प्रशासन का कहना है कि उनका व्यवहार सार्वजनिक व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा था।
सबसे अहम सवाल: क्या उन्हें जेल में रखना सही है?
सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी के बाद देश में सबसे बड़ा सवाल यही उठा, क्या उन्हें जेल में रखना वास्तव में जरूरी था? यह कार्रवाई अदालत से बेल मिलने के बाद भी हो सकती थी? कई कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि यह कदम अनुपयुक्त और बेहद कठोर था, क्योंकि उनका आंदोलन शांतिपूर्ण था। वे न तो हिंसा का समर्थन करते थे और न किसी हिंसक गतिविधि में शामिल थे। प्रशासन की ओर से कोई ठोस सबूत सार्वजनिक नहीं किए गए। यदि वास्तव में जांच जरूरी थी, तो सामान्य कानूनी प्रक्रिया के तहत भी पूछताछ जारी रह सकती थी।
एनएसए पर भी सवाल
एनएसए जैसी कठोर धारा का इस्तेमाल आमतौर पर आतंकवाद, चरमपंथ या बड़े दंगों में किया जाता है। ऐसे मामलों में, “खतरे” का स्तर बेहद उच्च होना चाहिए। लेकिन यहां तर्क यह दिया गया कि उनके विचार लोगों को उकसाने वाले थे, यह बात स्वयं में अस्पष्ट है और लोकतंत्र में विचारों की शक्ति से डरना सत्ता के लिए अच्छा संकेत नहीं है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट में इस गिरफ्तारी को चुनौती दी गई। अदालत में भी यह सवाल प्रमुख रहा कि क्या गिरफ्तारी के वास्तविक कारण समय रहते बताए गए और क्या एनएसए का उपयोग इस मामले में उचित था?
इस दौर में मुद्दे की उम्र बेहद छोटी
बहरहाल यह भी सच है कि इस सोशल मीडिया के दौर में किसी मुद्दे की उम्र बेहद छोटी हो गई है। कुछ घंटे चर्चा, कुछ दिन शोर, और फिर सबकी याददाश्त रीसेट। इससे उलट लोकतंत्र की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि उसके नागरिक किन मुद्दों को लगातार याद रखते हैं और किन पर कार्रवाई की मांग करते रहते हैं। यहां यह भी नहीं भूलना चाहिए कि राष्ट्र का पतन तब नहीं होता जब बाहरी ताकतें हमला करती हैं, बल्कि तब और तेजी में होता है जब लोग भीतर से असंवेदनशील हो जाते हैं। हमने कई बार ऐसे मामलों को देखा है जहां पत्रकारों, कार्यकर्ताओं और छात्रों को महीनों जेल में रखा गया, और जनता धीरे-धीरे उनकी कहानियाँ भूलती चली गई। वांगचुक की गिरफ्तारी इस सामूहिक भूल का एक और उदाहरण न बने इसलिए याददहानी बेहद जरुरी हो गई है। यह वही समय है जब समाज को अपनी संवेदनशीलता वापस पाने की जरूरत है।
क्या अपने नायकों को भूल रहे हैं हम
स्वयं सोच-विचार करें, क्या हम सिर्फ ट्रेंड देखकर आवाज़ उठाने वाले बन गए हैं? क्या हम अपने नायकों को भूलने वाले लोग हैं या उनका साथ देने वाले? लोकतंत्र में नागरिकों की आवाज़ ही असली ताकत होती है। यह ताकत तभी सार्थक है जब वह निरंतर, जागरूक और नैतिक साहस से भरी हो। यदि हम इतने कमजोर हो जाएं कि अपने ही सुधारकों को भूल जाएं, तो भविष्य का नुकसान निश्चित है। अंतत: याद रखिए, वांगचुक की गिरफ्तारी सिर्फ एक प्रशासनिक कदम नहीं; यह एक सामाजिक परीक्षा है। यह हमारी जागरूकता और हमारी नैतिक जिम्मेदारी की कसौटी है। उनकी लड़ाई पहाड़ों, नदियों, ग्लेशियरों और भविष्य की लड़ाई है।
आज जब वे सलाखों के पीछे हैं, तब यह देश के हर नागरिक की जिम्मेदारी है कि वह इस प्रश्न को जिंदा रखे—
“क्या हम अपने नायकों को भूलने वाले लोग हैं, या उनका साथ देने वाले?”
क्योंकि इतिहास हमें सिखाता है—
जो समाज अपने सुधारकों को भूल जाता है, वह खुद अपना भविष्य खो देता है।
अगर हम अपने नायकों को भूल गए, तो इतिहास हमें कभी माफ़ नहीं करेगा।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं, जिनसे सम्पादक का सहमत होना आवश्यक नहीं है)

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