बिरसा मुंडा पूरे देश के आदिवासी समाज के प्रेरणास्रोत (लेखक- कांतिलाल मांडोत / ईएमएस)
(बिरसा मुंडा 150जन्म जयंती)
15 नवंबर को हम हर वर्ष उसी वीर आदिवासी नेता को याद करते हैं जिसने न सिर्फ अपने जनजातीय समाज के लिए बल्कि पूरे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में एक अनूठी छाप छोड़ी । बिरसा मुंडा वर्तमान में जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाये जाने वाले इस दिन पर, भारत के आदिवासी समाज की महत्ता, उनके संघर्ष और उनके आने वाले कल की दिशा पर हमें सोचने-विचारने का अवसर मिलता है।आज, गुजरात में आयोजित धार्मिक-सांस्कृतिक समागम और आदिवासी कार्यक्रमों के बीच, वह इतिहास, उस विरासत और उस भविष्य के बारे में है जिसे हमें संजोना है । विशेष रूप से जनजाति समाज के संदर्भ में। यह आयोजन यू तो पूरे देश में विभिन्न कार्यक्रम के तहत मनाया जाएगा।लेकिन गुजरात मे यह आयोजन मोदी की उपस्थिति के कारण महत्वपूर्ण हो जाता है।
बिरसा मुंडा का जन्म 15 नवंबर 1875 को झारखंड के खूँटी-उलीहातू क्षेत्र में हुआ था। उनकी जात-पसंद मुंडा जनजाति थी, और उन्होंने बहुत ही कम आयु में यह अनुभव किया कि उनके साथी जनजातियों की जमीन-वन-जल से जुड़ी आज़ादी सिमटती जा रही है। उनका आंदोलन मुख्यतः इस ओर था कि आदिवासी अपनी जमीन, जंगल और पानी के अधिकार खोते जा रहे थे ।अंग्रेज़ सरकार की नीतियों, जमिनदारों (ज़मींदारों) और मिशनरियों की गतिविधियों के चलते। उन्होंने 1894 में उलगुलान के नाम से उस विद्रोह की शुरुआत की, जो आदिवासी समाज का अपना-राज, अपनी-भूमि का नारा लेकर चला।
उनकी मृत्यु बहुत ही कम उम्र में, 1900 में हुई। लेकिन उनकी विरासत आज भी हमारे बीच जीवंत है। “धरती आबा” (पृथ्वी के पिता) के नाम से आदिवासी समाज उन्हें याद करता है।
सांस्कृतिक समागम एवं गुजरात में आदिवासी कार्यक्रमों का महत्त्वपूर्ण स्थान है।गुजरात में, आदिवासी समाज के लिए आज के दिन के लिए अनेक कार्यक्रम आयोजित होंगे। जिसमें सांस्कृतिक प्रदर्शन, जन-सामाजिक संवाद, कार्यशालाएँ, लोक कलाएँ, हाथ के कारीगरों का मंच, आदिवासी युवाओं का मंच सहभागी होना शामिल है। यह सिर्फ एक यादगार कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक सम्मान-उत्सव है, जिसमें आदिवासी समाज की गौरवशाली विरासत, संस्कृति, भविष्य-दृष्टि और समान अवसरों पर प्रकाश डाला जाएगा।
ये कार्यक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे आदिवासी समुदाय को केंद्र में लाते हैं । उनके द्वारा, उनके लिए युवाओं को प्रेरणा देते हैं कि वे अपनी जड़ों से जुड़ें और आधुनिकता के साथ भी उन्हें अपनाएं।
सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से सामाजिक समावेशिता बढ़ती है । आदिवासी समाज के कल-कार और जीवन-शैली को पूरे समाज के सामने रखा जाता है।
जब एक कार्यक्रम के केंद्र में आदिवासी भाषा, लोकगीत-नृत्य, हस्त-शिल्प, खान-पान होता है, तो यह संकेत है कि उनकी संस्कृति अब अलग नहीं बल्कि भारत की विविधता का अभिन्न हिस्सा है।
विशेष रूप से आज के समय में, जब भारत ने जं जातीय गौरव दिवस को राष्ट्रीय रूप से माना है। हर वर्ष 15 नवंबर को यह एक अवसर है कि हम आदिवासी समाज के योगदान को सिर्फ स्मरण न करें बल्कि उसे उत्सव के रूप में मनाएं।
*प्रधानमंत्री की उपस्थिति एवं कार्यक्रमों की विशेषता*
आज के कार्यक्रमों में नरेंद्र मोदी की उपस्थिति से यह संदेश जाता है कि केंद्र सरकार इस दिवस और आदिवासी समाज के कार्यक्रमों को कितनी गंभीरता से ले रही है। यह उपस्थिति आदिवासी समाज के लिए आत्म-सम्मान और उनकी आवाज़ को मान्यता देने का प्रतीक है।आदिवासी लोक-नृत्य एवं गीत संस्कृति का जश्नहोगा।
हस्त-शिल्प व कला-प्रदर्शनी और आदिवासी जीवन-शैली एवं कला-प्रवृत्तियों का प्रदर्शनकिया जायेगें। संवाद सत्र: आज की चुनौतियाँ, कल के अवसर,
योजनाओं की जानकारी और आदिवासी समाज को विकास-योजनाओं से जोड़ने का मुख्य लक्ष्य रहेगा। खेल, प्रतिस्पर्धाएँ, प्रेरणा-वक्तव्यआदि मुख्य है।इस तरह के समागम न केवल यादगार होंगे, बल्कि प्रेरणादायक भी होंगे।एक ऐसा पल जब जनजातीय समाज और अन्य समाज एक साथ खड़े होंगे, एक-दूसरे को समझेंगे, सम्मान देंगे और साझा भविष्य का निर्माण करेंगे।
*जनजाति समाज के लिए “यादगार पल” क्यों?*
यादगार पल” इसलिए क्योंकि आज के इस दिन आदिवासी समाज की जातिगत अलगाव-तल से निकलने की यात्रा को दस्तावेजित करता है।उनके हीरो को राष्ट्रीय मंच पर मान्यता मिल रही है । बिरसा मुंडा जैसे नायकों को आदिवासी समाज का प्रतीक और पूरे देश की प्रेरणा माना जा रहा है।गुजरात जैसे विविध राज्य में आदिवासी कार्यक्रम होने से यह संकेत मिलता है कि जनजाति-विषय सिर्फ खास-क्षेत्रीय नहीं बल्कि सम्पूर्ण भारत का विषय बन रहा है।
कार्यक्रमों के माध्यम से समाजिक समावेशिता, संस्कृति-पुनरुद्धार, युवाओं को सशक्त बनाने का अवसर मिल रहा है।और सबसे बड़ी बात है कि यह संस्कृति-उत्सव है। हम सिर्फ इतिहास याद नहीं कर रहे, बल्कि एक उत्सव-भावना के साथ आगे बढ़ने की प्रेरणा ले रहे हैं।भविष्य की दिशा तय होगी। आदिवासी समाज का सशक्तिकरण बिरसा मुंडा ने जिस स्वराज-सपने को देखा था अबुआ राज, अबुआ दिशुम” हमारा राज्य, हमारी दिशा आज उसका स्वरूप कुछ अलग है पर संकल्प वही है।आदिवासी समाज को सम्मान, अधिकार, अवसर मिलें। वक्त की मांग है कि कार्यक्रमों से निकलकर वास्तविक क्रियान्वयन हो।आदिवासी युवाओं को शिक्षा-स्वास्थ्य-रोज़गार के अवसर मिले। उनकी कलाएँ-हस्त-शिल्प सुरक्षित, समृद्ध हों।जमीन-वन-जल के अधिकार सुनिश्चित हों।
उनके अनुभव, ज्ञान-परंपरा को आधुनिक विकास के साथ जोड़ने की पहल हो।
समाज में आदिवासी-विभाग के प्रति पूर्वाग्रह कम हो, समावेश बढ़े।यदि आज का कार्यक्रम “यादगार पल” बनाना है, तो उसके बाद कल का परिवर्तन भी जरूरी है। आदिवासी समाज के लिए यह सिर्फ एक दिन नहीं, यह एक संकल्प-प्रारंभ होना चाहिए।
आज, जब हम बिरसा मुंडा की जयंती पर एक बड़े सांस्कृतिक समागम में जुट रहे हैं।जहाँ मोदी-सराहना होंगी, आदिवासी-कलाएँ होंगी, युवाओं का उत्साह दिखेगा, तो हमें यह याद रखना है कि यह केवल उत्सव नहीं है, बल्कि उत्तरदायित्व है।हमारा उत्तरदायित्व है कि इस यादगार पल को हम यादगार असर में बदलें।आदिवासी समाज की गरिमा, उनके योगदान, उनकी आकांक्षाओं को समस्त भारत के विकास-सफर में सुदृढ़ करें।
इसलिए इस 15 नवंबर को आइए हम न सिर्फ बिरसा मुंडा को याद करें, बल्कि उनके उस सपने को पुनः संकल्प करें। जहाँ आदिवासी समाज अपने अधिकारों, अपनी संस्कृति, अपनी पहचान के साथ आगे बढ़े। जहाँ गुजरात में आयोजित ये कार्यक्रम सिर्फ एक आयोजन नहीं रहे, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए राह-निर्देशक बने।
शत्-शत् प्रणाम “धरती आबा” को और आदिवासी समाज को सलाम, जिन्होंने हमें सिखाया कि स्वाभिमान के साथ इतिहास बनता है।
( L103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड़, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार,स्तम्भकार)
