06 June, 2026 (Saturday)

सुप्रीम कोर्ट के आदेश से सुरक्षा और पशु कल्याण की दिशा में बड़ा कदम (लेखक – कांतिलाल मांडोत /ईएमएस)

देश में बढ़ते सड़क हादसों, अव्यवस्था और पशु क्रूरता की घटनाओं के बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को आदेश दिया है कि वे राज्य और राष्ट्रीय राजमार्गों से आवारा पशुओं और आवारा कुत्तों को तुरंत हटाएं और उन्हें सुरक्षित आश्रयों में रखें। यह आदेश न केवल सड़क सुरक्षा से जुड़ा है बल्कि यह पशु-कल्याण, सार्वजनिक स्वच्छता और मानवीय संवेदना से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।सुप्रीम कोर्ट ने 7 नवंबर 2025 को सुनवाई के दौरान कहा कि राज्य सरकारें, स्थानीय निकाय, एनएचएआई और सार्वजनिक निर्माण विभाग यह सुनिश्चित करें कि राजमार्गों, एक्सप्रेसवे और सार्वजनिक स्थलों पर कोई भी आवारा पशु या कुत्ता न दिखे।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि इन पशुओं को मारना या दूर फेंकना नहीं, बल्कि उन्हें पशु आश्रयों में उचित देखभाल के साथ रखा जाए।संबंधित अधिकारियों की व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जाएगी और इसका पालन करना जरूरी है। वरना अधिकारियों को व्यक्तिगत तौर पर जिम्मेदार ठहराया जाएगा।इस मामले में तीन हफ्ते से स्टेट रिपोर्ट और हलफननामा मांगने को कहा है।सड़को पर समूह में गाय और भैंसे बैठ जाती है।आवारा कुत्तों का आतंक भी देश के शहरों की गलियो और गांव के मोहल्ले में आवारा पशुओं के कारण दुर्घटना और आवारा कुत्तों के काटने की घटना अक्सर होती है।आवारा पशुओं के कारण यातायात प्रभावित होता है।इतना ही नही,आवारा पशु सड़क पर बैठे रहते है तो दुर्घताग्रस्त होते देखे गए है।
पशुओ के हटाने का आदेश सुप्रीम कोर्ट की खंडपीठ ने पहले भी दिया है।राजमार्गो से पशुओ को हटाने के निर्देश और आवारा कुत्तों पर रोक लगाने का आदेश दिया गया था।आवारा कुत्तों की मौजूदगी से मुक्त करने का उद्देश्य विफल भी हुआ था।सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए प्रत्येक हाईवे के किनारे हेल्पलाइन नंबर और चेतावनी बोर्ड लगाए जाएं ताकि कोई भी व्यक्ति तुरंत सूचना दे सके।
नगरपालिकाएं और पंचायतें मिलकर स्थायी आश्रय गृह बनाएं, जहाँ चिकित्सा, भोजन और सुरक्षा की उचित व्यवस्था हो। सड़क सुरक्षा और जनहित का पक्ष लेते हुए सुप्रीम ने निर्देश दिए है।हररोज दुर्घटना आवारा पशुओं के कारण होती है।भारत में सड़क दुर्घटनाओं का एक बड़ा कारण आवारा पशु और कुत्ते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने जिम्मेदारी तय कर रिपोर्ट देने का आदेश जारी किया है।जिसमे स्कूल,अस्पताल, बस स्टैंड से अगले आठ हफ़्तों से आवारा कुते हटाना होगा।
भूटान में आवारा कुत्तों की नसबंदी के अभियान में सम्पूर्ण सफलता मिली है।उसी की तरह नीदरलैंड पहला यूरोपीय देश है, जहा सड़को पर आवारा कुत्ते नही है। भारत मे हर गांव में सैकड़ो कुत्ते मिल जाएंगे।जिनका कहर निर्दोष मासूमो पर बरपाया जाता है।क्योकि नन्हे बच्चे कुतो का सामना नही कर सकते है।कभी कभी बड़े बुजुर्ग भी डॉग बाइट का शिकार होते है।
भारत में आवारा कुत्तों तथा अन्य मुक्त घूमने वाले पशुओं के हमले-दुर्घटनाएँ एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या बन चुकी हैं। न सिर्फ काटने – हमले के कष्ट बल्कि रोग संक्रमण रेबीज़ और दुर्घटनाओं के रूप में इसका व्यापक प्रभाव है।
भारत में वर्ष 2024 में लगभग 3,717,336 37.17 लाख कुत्तों द्वारा काटे जाने की रिपोर्ट दर्ज हुई है। वर्ष 2023 में लगभग 30.43 लाख कुत्तों द्वारा काटे जाने के मामले थे, जिनमें 286 लोगों की मृत्यु हुई। एक अन्य सरकारी आंकड़े के अनुसार, वर्ष 2024 में कुत्तों द्वारा काटे जाने के लगभग 21.95 लाख मामले और अन्य जानवरों जैसे बन्दर आदि द्वारा लगभग 5.04 लाख मामले थे, तथा इस दौरान लगभग 48 लोगों की मौत हुई।
विशेष रूप से बच्चों की स्थिति चिंताजनक है । वर्ष 2024 में कुत्तों द्वारा काटे जाने वाले कुल मामलों में लगभग 5,19,704 मामले केवल 15 वर्ष से कम आयु के बच्चों के थे। हालांकि सरकार द्वारा 2024 के लिए अनुमानित कुल मानव रेबीज़ मृत्यु सिर्फ 54 बताई गई है।
लेकिन शोध एवं अन्य सर्वेक्षण बताते हैं कि वास्तविक मृत्यु संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है । भारत में हर साल लगभग 18,000-20,000 रेबीज़ मृत्यु होती हैं।
इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि कुत्तों और अन्य आवारा पशुओं द्वारा काटे जाने की घटनाएँ लाखों में हैं, और इससे जुड़ी मृत्यु-दर तथा दुर्घटनाओं की संख्या चिंताजनक रूप ले रही है।आवारा कुत्तों की संख्या एवं मानवीय-पर्यावरणीय स्थिति चिंताजनक है।
भारत में बड़े-बड़े शहरी एवं ग्रामीण क्षेत्रों में आवारा कुत्तों की संख्या बहुत अधिक है। उदाहरण के लिए, एक सर्वेक्षण में बताया गया कि भारत में लगभग 6.2 करोड़ 62 मिलियनआवारा कुत्ते हो सकते हैं। कचरा प्रबंधन, खाद्य स्रोत, अनियंत्रित प्रजनन, और आवासीय-शहरी विस्तार जैसी स्थितियों ने इन जानवरों के मानव निवास के करीब आने की संभावना बढ़ा दी है।
कुत्तों एवं अन्य जानवरों द्वारा मानवों पर हमला या काटने की स्थितियाँ बढ़ रही हैं, विशेष रूप से बच्चों, वृद्धों और काम करने वाले लोगों में अधिक है। वर्ष 2024 में लगभग 60 घंटों में एक बार बच्चों द्वारा कुत्तों द्वारा काटे जाने की दर सामने आई थी।
इसके अलावा वाहन-दुर्घटनाएँ भी होती है।आवारा पशु अचानक सड़क पर आने से वाहन चालक अनियंत्रित हो सकते हैं या दुर्घटना का शिकार हो सकते हैं। विशेष रूप से रात में व ग्रामीण इलाकों में यह जोखिम अधिक है।
रेबीज़-संक्रमण का खतरा कुत्तों द्वारा काटे जाने के बाद यदि समय पर एंटी-रेबीज़ टीकाकरण एवं पशु-क्षेत्र की निगरानी न हो तो मृत्युदर बहुत अधिक हो सकती है। रेबीज़ एक-बार लक्षण दिखने के बाद लगभग 100 % घातक है। भारत में रेबीज़ के लिए लक्षित कार्यक्रम चल रहे हैं लेकिन अभी तक स्थितियाँ लक्ष्य के अनुरूप नहीं हैं।
अधिकारियों द्वारा दर्ज की गयी संख्या व अनुमानित संख्या में अंतर है।सरकार द्वारा घोषित 54 मौतें और कुछ शोधों के अनुसार लगभग 5,700 अनुमानित मौतों के अंतर को लेकर चिंताएँ हैं। वैकसीनेशन और पशु-संख्या नियंत्रण में कमियों के कारण समस्या गंभीर है । भारत में 2024 तक एनीमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियम2023 जैसे निर्देश जारी किये गए लेकिन उनका क्रियान्वयन सुचारू नहीं है।
स्थानीय-शहरी-ग्रामीण भिन्नताएँ है।शहरी क्षेत्रों में आवारा कुत्तों का चयन, मानव-पशु संघर्ष अधिक देखा जा रहा है। ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य-सुविधाओं की कमी जोखिम बढ़ाती है।
दुर्घटनाओं की संख्या का स्पष्ट आँकड़ा नहीं मिलना है।जहाँ काटे जाने की संख्या उपलब्ध है, वाहन और अन्य प्रकार की दुर्घटनाओं जैसे वाहन-पशु टक्कर के कारणों व संख्या पर विश्वसनीय डेटा कम है।
जब एक आवारा कुत्ता काटता है, तब समस्या सिर्फ शारीरिक घाव तक सीमित नहीं रहती। इसके बाद ये स्थितियाँ उत्पन्न हो सकती हैं।काटे जाने से डर-चोट की वजह से लोगों का जीवन प्रभावित होता है ।खेल-कूद से दूर रहने, सामाजिक गतिविधियों में कमी आदि पर चिंतन किया जाना चाहिए।
वाहन चलाते समय अचानक कुत्ता सड़क पर आ जाने से वाहन चालक फिसल सकते हैं, ब्रेक अचानक लगा सकते हैं, या टकराने-उछलने की वजह से दुर्घटना हो सकती है।शहरी एवं ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में सार्वजनिक स्वास्थ्य-व्यय बढ़ता है।
आवारा कुत्तों का जनसंख्या नियंत्रण एवं टीकाकरण के निर्देश सुप्रीम कोर्ट दे चुकी है।लेकिन यह मुहिम टाय टाय फीस होती गई।स्थानीय निकायों नगर-पंचायती को सक्रिय रूप से ‘स्टेरिलाइज़ेशन -टीकाकरण कार्यक्रम चलाना होगा। सड़क एवं सार्वजनिक स्थानों पर सुरक्षा-उपाय: स्कूलों, पार्कों व बच्चों के खेलने वाले इलाकों के आसपास आवारा कुत्तों के दृष्टिगत निगरानी बढ़ानी होगी। दुर्घटना-रोकथाम के लिए ड्राइवर्स को सावधानी रखने का प्रशिक्षण व चेतना देना होगा।
कुत्ते द्वारा काटे जाने पर तुरंत साबुन-पानी से घाव धोना, एंटी-रेबीज़ टीका लगवाना बेहद जरूरी है। समय पर उपचार से मृत्यु-दर को काफी कम किया जा सकता है। लोगों को पता होना चाहिए कि अनजान कुत्तों से खतरा हो सकता है, बच्चों को सिखाना होगा कि किसी आवारा कुत्ते को न छुएँ।
वाहन-पशु टक्कर तथा कुत्तों से मानव दुर्घटनाओं का डेटा संकलित करना आवश्यक है ताकि नीति-निर्माण आधारित हो सके।आवारा कुत्तों तथा अन्य मुक्त जानवरों द्वारा काटे जाने और उनसे उत्पन्न हो रही दुर्घटनाएँ भारत में एक स्पष्ट सार्वजनिक स्वास्थ्य-चुनौती बन चुकी हैं। लाखों लोग प्रतिवर्ष कुत्तों द्वारा काटे जाते हैं। 2024 में 37 लाख मामले प्रकाश में आये है। अनुमानित वास्तविक संख्या कहीं अधिक हो सकती है। बच्चों सहित कमजोर वर्ग विशेष रूप से जोखिम में हैं। समस्या के समाधान के लिए केवल एक-दो उपाय पर्याप्त नहीं होंगे । यह एक बहु-आयामी प्रयास है जिसमें पशु-जनसंख्या नियंत्रण, चिकित्सा-प्राप्ति, सार्वजनिक शिक्षा, शहरी नियोजन तथा डेटा संग्रह सभी शामिल हैं। यदि समय रहते सक्रिय कदम नहीं उठाए गए, तो यह न सिर्फ जान-हानि बल्कि सामाजिक एवं आर्थिक बोझ भी बनती जा रही है। क्योकि यह पूरे भारत की समस्या है।
(वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार,स्तम्भकार)
(यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है)

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