06 June, 2026 (Saturday)

भर्ती की नई व्यवस्था से खर्च के अलावा नौकरी पाने वाले उम्मीदवारों को मानसिक तनाव से भी मिलेगा छुटकारा

केंद्र सरकार की नौकरियों के लिए प्रतियोगी छात्रों को में केंद्रीय स्तर पर अलग-अलग लगभग 20 भर्ती बोर्डो की परीक्षाएं देनी होती हैं। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक केंद्र सरकार की करीब सवा लाख वेकेंसी के लिए हर साल ढाई से तीन करोड़ छात्र आवेदन करते हैं। छात्रों को सामान्यतया केंद्र सरकार में एसएससी, बैंक और रेलवे जैसी परीक्षाओं में हर साल 10-15 फॉर्म अलग-अलग भरने पड़ते हैं। प्रत्येक बार युवाओं को तीन-चार सौ रुपये से लेकर आठ-नौ सौ रुपये तक की फीस भरनी पड़ती है। हर बार अलग-अलग प्रतियोगिता परीक्षा भी देनी पड़ती है। हर भर्ती की परीक्षा तिथियां अलग-अलग होती हैं और आवेदन प्रक्रिया भी अलग-अलग होती है। कई बार एक से अधिक परीक्षाओं की तारीखें एक ही दिन पड़ने से अभ्यर्थियों को कोई एक एग्जाम छोड़ना पड़ता है।

अक्सर यह देखने में आता है कि कई बार जब दो-तीन परीक्षा करानी होती है, तो इन्फ्रास्ट्रक्चर की कमी की वजह से कई जगहों पर नकल की आशंका भी बढ़ जाती है। परीक्षा के दौरान केंद्रों की सुरक्षा के लिए जिला प्रशासन को अलग से अधिकारियों और पुलिस को तैनात करना पड़ता है। बार-बार परीक्षाएं होने से बार-बार इस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। इससे खर्च बढ़ने के साथ-साथ भर्ती की प्रक्रिया लंबी हो जाती है। इस प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए लंबे समय से ऐसी किसी भर्ती एजेंसी की मांग हो रही थी जो सभी नौकरियों के लिए कॉमन हो। इसके लिए अब सरकार ने राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी का गठन किया है। लिहाजा यह ऐतिहासिक सुधार है जिसके जरिये भर्ती, चयन और नौकरी तीनों में आसानी होगी। इस सुधार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि देश के हर जिले में कम से कम एक परीक्षा केंद्र होगा, जो दूरदराज के इलाकों में रहने वाले उम्मीदवारों तक पहुंच बढ़ाएगा। इसकी एक खासियत यह भी है कि आने वाले समय में राष्ट्रीय भर्ती एजेंसी द्वारा आयोजित परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों को प्रदत्त सीईटी स्कोर को केंद्र सरकार, राज्य सरकार, केंद्र शासित प्रदेशों, सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों, निजी क्षेत्र की अन्य भर्ती एजेंसियों आदि के साथ साझा किया जा सकेगा ताकि अन्य क्षेत्र भी लाभान्वित हो सकें।

भर्ती प्रक्रिया को आसान बनाने की कोशिश : प्रतियोगी परीक्षाओं को कराने की वर्तमान में जो व्यवस्था है, इसके तहत उम्मीदवारों को विभिन्न परीक्षाओं में उपस्थित होने के लिए लंबी दूरी भी तय करनी पड़ती है। इससे युवाओं का धन, श्रम और समय ज्यादा लगता है। विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र की लड़कियों को काफी कठिनाई होती है। शहर में आकर रहने और आवाजाही के लिए उन्हें अनेक मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। साथ ही, विभिन्न भर्ती बोर्डो को भी तारीखों का चयन करने में समस्या होती है, लेकिन अब कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट के आने से इस समस्या का काफी हद तक समाधान हो जाएगा। अब परीक्षाएं कम होंगी, तो उम्मीदवारों को तारीखों को लेकर ज्यादा परेशान नहीं होना पड़ेगा। इस लिहाज से सरकार का एक कॉमन परीक्षा का कदम सराहनीय है। लेकिन सरकार को पूरी तरह से जांच पड़ताल कर ही इस योजना को अमलीजामा पहनाना चाहिए। यह ध्यान रखना होगा कि कॉमन एलिजिबिलिटी टेस्ट में कहीं यूपीएससी परीक्षा में हिंदी बनाम अंग्रेजी जैसा विवाद न खड़ा हो जाए, कहीं मैथ्स या फिर अंग्रेजी भाषा को तरजीह का सवाल न खड़ा हो जाए, आखिर ये करोड़ों युवाओं के करियर का सवाल है।
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