05 September, 2026 (Saturday)

ट्रंप के बाद भी अमेरिका पाकिस्तान संबंधों में गर्माहट आने की कोई संभावना दूर दूर तक नहीं – एक्‍सपर्ट व्‍यू

शायद अमेरिकी चुनावों को लेकर भारत में इस बार कहीं ज्यादा उत्सुकता बनी हुई थी। यही कारण था कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने बड़बोलेपन व बिंदास अंदाज के लिए समाचारों में बने रहे। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की निजी केमिस्ट्री भी समाचारों में स्थान पाती रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ‘हाउडी मोदी’ रैली में मोदी के साथ हाथों में हाथ डालकर भारतीयों का अभिवादन करना अभी भी भारतीयों के मस्तिष्क पटल पर बना हुआ है।

हालांकि राजनीति में अपेक्षाकृत कम अनुभवी ट्रंप, अनुभवी हिलेरी क्लिंटनको हराकर राष्ट्रपति पद पर पहुंचे थे और उस दृष्टि से 78 वर्षीय जोसेफ बाइडन 1973 से ही राजनीति में सक्रिय रहे हैं। इस बीच वे बराक ओबामा के कार्यकाल में अमेरिका के उपराष्ट्रपति भी रह चुके हैं। ऐसे में बाइडन अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भारत की अहम भूमिका के बारे में भलीभांति परिचित हैं। अमेरिका के भारत के साथ संबंध काफी उतार चढ़ाव वाले रहे हैं। शीत युद्ध के दिनों में भारत की तटस्थ नीति अमेरिका को कभी रास नहीं आई। उन दिनों हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान के साथ अमेरिका के संबंध अधिक दोस्ताना हुआ करते थे।

भारत पाक युद्ध के दौरान अमेरिका द्वारा भारत के विरुद्ध वीटो का उपयोग भारत कभी भूला नहीं। लेकिन उस समय के बाद भारत और दुनिया में काफी बदलाव हो चुके हैं। इस बीच सोवियत संघ के विघटन और भूमंडलीकरण के विस्तार में जाने अनजाने अमेरिका को भारत का भरपूर साथ मिला। पिछले लगभग तीन दशकों में प्रौद्योगिकी कंपनियों, ई-कॉमर्स कंपनियों, फार्मा कंपनियों समेत अमेरिकी कॉरपोरेट का भारत में खासा विस्तार हुआ है। अमेरिका भारत का सबसे बड़ा व्यापार साझेदार इसी काल में बना। हालांकि चीन से भारी आयातों के चलते पिछले कुछ वर्षों से यह स्थान चीन ने ले लिया था। आज बड़ी संख्या में भारतीय लोग अमेरिकी अर्थव्यवस्था और प्रशासन मेंअहम भूमिका का निर्वहन भी कर रहे हैं।

भारत, अमेरिका और विश्व के संबंधों की बात करें तो पिछले काफी समय से अमेरिका का पाकिस्तान से काफी हद तक मोहभंग हो चुका है। पाकिस्तान के आतंकवाद में डूबे होने के कारण अमेरिका की पाकिस्तान से दूरी और भारत के साथ नजदीकी बनती गई। आतंकवाद में लिप्तता के कारण पाकिस्तान फाइनेंशियल एक्शन टास्क फोर्स की ‘ग्रे सूची’ में है और उसे कभी भी ‘ब्लैक सूची’ में डाला जा सकता है। साथ ही, पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान की आर्थिक स्थिति में लगातार गिरावट आती जा रही है। ऐसे में अमेरिकी प्रशासन में बदलाव के बाद भी अमेरिकापाकिस्तान संबंधों में गर्माहट आने की दूर दूर तक कोई संभावना नहीं है।

जहां तक चीन का सवाल है तो ट्रंप ने राष्ट्रपति बनने से पहले ही चीन के साथ युद्ध छेड़ रखा था, जिसने पिछले करीब दो वर्षों से व्यापार युद्ध का रूप ले लिया था। पिछले दो दशकों से अपनी आक्रामक आर्थिक नीतियों, विशेष तौर पर व्यापार नीति के चलते चीन ने अमेरिका को आर्थिक चुनौती दे रखी थी। आम तौर पर यह मानाजा रहा है कि बाइडन चीन के प्रति नरमरुख अपना सकते हैं, लेकिन समझना होगा कि पिछले काफी समय से अमेरिका के साथ इसके तल्ख संबंध चल रहे हैं। जिस प्रकार से चीन की विस्तारवादी नीति के कारण प्रशांत महासागर में भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया द्वारा पिछले कुछ समय से संयुक्त रूप से सैन्य अभ्यास चल रहे हैं, उन्हें विराम देना संभव नहीं होगा।

भारत के साथ व्यापार : यह नहीं भूलना चाहिए कि हालांकि ट्रंप चीन के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए सामरिक एवं कूटनीतिक दृष्टि से भारत के अधिक नजदीक दिखते थे, लेकिन आर्थिक दृष्टि से वे भारतीय हितों के खिलाफ लगातारफैसले लेते रहे। व्यापार युद्ध में उनका पहला निशाना चीन ही था, लेकिन उसी क्रम में उन्होंने पहले भारत से आने वाले आयातों पर शुल्क बढ़ाया और बाद में तो कई दशकों से भारत को अमेरिका द्वाराप्रदत्त, अन्य देशों से कम आयात शुल्क पर प्राथमिकता के आधार पर आयात की व्यवस्था को भी समाप्त कर दिया। यहीनहीं, अमेरिका में काम कर रहे इंजीनियरों और अन्य कार्मिकों के लिए भी वीसा नियमों को प्रतिकूल बनाना उन्होंने शुरू कर दिया था, जिसके चलते अमेरिका मेंभारतीयों पर अनिश्चितता की तलवार लटकने लगी थी।
विश्व में सबसे ज्यादा कोरोना संक्रमण और मौतों के चलते एक ओर स्वास्थ्य संकट व दूसरी ओर आर्थिक संकटों से पार पाना बाइडन की पहली प्राथमिकता होगी। इसके अतिरिक्त अमेरिका की एक महाशक्ति की छवि को पहले से काफी धक्का लगा है, क्योंकि ट्रंप यूरोप एवं अपने अन्य सहयोगी और मित्र देशों केसाथ मधुर संबंध बनाए रखने में असफल रहे। इसके चलते अमेरिका की छवि और शक्ति दोनों प्रभावित हुए हैं। महामारी के चलते भूमंडलीकरण के प्रति दुनिया कामोह भी भंग हुआ है, जिसका नुकसान अमेरिका को उठाना पड़ेगा। अमेरिका कोअपनी महाशक्ति की छवि को पुनर्स्‍थापित करने में बाइडन कितना सफल होते हैं, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि वे अमेरिकी समस्याओं का कितना निदान कर पाते हैं। लेकिन उन्हें यह तो समझना ही होगा कि दुनिया की उभरती हुई शक्तियों में से भारत सबसे अधिकविश्वसनीय दोस्त रह सकता है।
Spread the love

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed