गुरु प्रदोष व्रत कथा: इस पौराणिक कथा के बिना अधूरा माना जाता है यह व्रत
आज गुरु प्रदोष व्रत है जिसे बृहस्पति प्रदोष व्रत के नाम से भी जाना जाता है। कहते हैं इस व्रत को करने से ज्ञान, धर्म, शिक्षा, धन और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस व्रत का संपूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब इस व्रत की कथा पढ़ी जाए।
गुरु प्रदोष व्रत का सनातन धर्म में विशेष महत्व माना जाता है। कहते हैं इस व्रत को करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। जब प्रदोष व्रत गुरुवार के दिन पड़ता है तो वो गुरु प्रदोष व्रत कहलाता है। 8 अक्टूबर को गुरु प्रदोष व्रत ही है। इस दिन शिव पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 5 बजकर 59 मिनट से 8 बजकर 27 मिनट तक रहेगा। यहां आप जानेंगे गुरु प्रदोष व्रत की कथा।
गुरु प्रदोष व्रत कथा
गुरु प्रदोष व्रत की कथा अनुसार, एक बार इन्द्र और वृत्रासुर की सेना में घनघोर युद्ध छिड़ गया था। तब देवताओं ने दैत्य-सेना को पराजित कर नष्ट कर डाला था। दैत्यों को पराजित होता देख वृत्रासुर स्वयं युद्ध को उद्यत हुआ। उसने अपनी आसुरी माया से विकराल रूप धारण कर लिया जिससे सभी देवता भयभीत होकर गुरुदेव बृहस्पति की शरण में पहूंचे। तब बृहस्पति देव बोले कि पहले मैं आप सभी को वृत्रासुर का वास्तविक परिचय दे दूं।
वृत्रासुर बड़ा तपस्वी और कर्मनिष्ठ है। उसने गन्धमादन पर्वत पर घोर तपस्या कर महादेव को प्रसन्न किया। पूर्व समय में वह चित्ररथ नाम का राजा हुआ करता था। एक बार वह कैलाश पर्वत पहुंचा। वहां शिव जी के वाम अंग में माता पार्वती को विराजित देख उसने उपहास पूर्वक बोला- हे प्रभो! मोह-माया में फंसे होने के कारण हम स्त्रियों के वशीभूत रहते हैं। लेकिन देवलोक में ऐसा पहले कभी दृष्टिगोचर नहीं हुआ कि कोई स्त्री आलिंगनबद्ध हो सभा में बैठे।
चित्ररथ के यह वचन सुन शिव शंकर भगवान हंसकर बोले- हे राजन! मेरा व्यावहारिक दृष्टिकोण अलग है। मैंने मृत्युदाता कालकूट महाविष का पान किया है, फिर भी तुम साधारण जन की भांति मेरा उपहास उड़ा रहे हो। लेकिन माता पार्वती को चित्ररथ की इस हरकत पर अत्यंत क्रोध आ गया और वे बोलीं- अरे दुष्ट! तूने सर्वव्यापी महेश्वर के साथ मेरा भी उपहास उड़ाया है। अतएव मैं तुझे अब ऐसी शिक्षा दूंगी कि फिर तू कभी ऐसे संतों के उपहास का दुस्साहस नहीं करेगा। मैं तुझे शाप देती हूं कि अब तू दैत्य स्वरूप धारण कर विमान से नीचे गिर।
माता के अभिशाप के कारण चित्ररथ राक्षस योनि को प्राप्त हुआ और त्वष्टा नामक ऋषि के श्रेष्ठ तप से उत्पन्न हो वृत्रासुर बना। गुरुदेव बृहस्पति बोले- वृत्तासुर बाल्यकाल से ही भगवान शिव भक्त रहा है। अतः हे इन्द्र तुम बृहस्पति प्रदोष व्रत कर भगवान शिव को प्रसन्न करो। देवराज ने गुरुदेव की आज्ञा अनुसार बृहस्पति प्रदोष व्रत किया। इस व्रत को करने से इन्द्र ने शीघ्र ही वृत्रासुर पर विजय प्राप्त कर ली जिससे देवलोक में शान्ति छा गई। बोलो उमापति शंकर भगवान की जय।
