18 October, 2026 (Sunday)

दिल्ली में इंटरनेट बंद करने पर केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से मांगी माफी, मेट्रो पाबंदियों पर भी घिरा प्रशासन

Delhi Protest : दिल्ली में 10 अक्टूबर को कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के दौरान इंटरनेट सेवाएं बाधित होने और मेट्रो स्टेशनों पर पाबंदियां लगाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। केंद्र सरकार ने इंटरनेट बंद करने के फैसले पर बिना शर्त माफी मांगी। वहीं, DMRC ने स्पष्ट किया कि मेट्रो पूरी तरह बंद नहीं थी और 303 में से 45 स्टेशनों पर पाबंदियां लगाई गई थीं।
Delhi Protest : केंद्र सरकार ने 10 अक्टूबर को दिल्ली में इंटरनेट सेवाएं बाधित करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष बिना शर्त माफी मांगी है। गृह सचिव गोविंद मोहन की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और अफवाहों को फैलने से रोकने के उद्देश्य से इंटरनेट सेवाओं पर रोक लगाने का फैसला लिया गया था। इस मामले में अदालत केंद्र सरकार और संबंधित अधिकारियों की कार्रवाई पर सुनवाई कर रही है।

DMRC ने मेट्रो बंद होने के दावों पर क्या कहा?
दिल्ली मेट्रो रेल कॉरपोरेशन (DMRC) ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि 10 अक्टूबर को मेट्रो सेवाएं पूरी तरह बंद नहीं की गई थीं। कुल 303 स्टेशनों में से 45 स्टेशनों पर प्रवेश और निकास को लेकर प्रतिबंध लगाए गए थे। DMRC के अनुसार, ये कदम दिल्ली पुलिस के निर्देशों के आधार पर उठाए गए थे। अदालत में दाखिल हलफनामे में मेट्रो सेवाओं को पूरी तरह बंद किए जाने के आरोपों पर स्पष्टीकरण दिया गया।

10 अक्टूबर को दिल्ली में क्यों लगाए गए थे प्रतिबंध?
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विरोध और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने की घोषणा की थी। दिल्ली पुलिस ने प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी थी। इसके बाद राजधानी के कई हिस्सों में बैरिकेडिंग की गई, मेट्रो स्टेशनों पर प्रतिबंध लगाए गए और इंटरनेट सेवाएं बाधित होने की शिकायतें सामने आईं। प्रदर्शन के दौरान कई लोगों को हिरासत में भी लिया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने पाबंदियों पर क्या निर्देश दिए थे?
प्रदर्शन के मद्देनजर मेट्रो और रेल सेवाओं पर व्यापक प्रतिबंध लगाए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर को हस्तक्षेप किया था। अदालत ने आवश्यक सार्वजनिक परिवहन सेवाओं को पूरी तरह रोकने के बजाय परिस्थितियों के अनुसार नियंत्रित तरीके से संचालित करने पर जोर दिया था।

इसके बाद 11 अक्टूबर को न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने मामले की विशेष सुनवाई की। अदालत ने अधिकारियों को नोटिस जारी करते हुए निर्देश दिया कि मेट्रो और रेल सेवाएं सामान्य रूप से चलें, इंटरनेट सेवाएं बाधित न हों और लोगों की आवाजाही सुनिश्चित की जाए। हालांकि, कानून-व्यवस्था और यातायात संबंधी वैध प्रतिबंध लागू किए जा सकते हैं।

याचिकाकर्ताओं ने क्या आरोप लगाए?
इस मामले में दाखिल याचिकाओं में आरोप लगाया गया कि 9 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बावजूद अगले दिन दिल्ली में परिवहन सेवाओं और लोगों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगाए गए। याचिकाकर्ताओं ने हिरासत में लिए गए लोगों के मामले को भी अदालत के समक्ष उठाया और कार्रवाई को लेकर जवाबदेही तय करने की मांग की।
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस का पक्ष रखा। वहीं, वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, गोपाल शंकरनारायणन, मेनका गुरुस्वामी, संजय हेगड़े, शोएब आलम और शादान फरासत ने याचिकाकर्ताओं की ओर से दलीलें पेश कीं।

CJP नेताओं की हिरासत का मामला भी उठा
प्रदर्शन के सिलसिले में CJP की शीर्ष नेतृत्व टीम के अभिजीत दीपके, सौरव दास और आशुतोष रांका को हिरासत में लिए जाने का मामला भी सामने आया। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, तीनों को दिल्ली पहुंचने के दौरान विमान से हिरासत में लिया गया था। मजिस्ट्रेट अदालत के आदेश के बाद उन्हें रिहा किया गया। उनकी हिरासत की अवधि और पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठाए गए।

याचिकाओं में यह भी आरोप लगाया गया कि अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, दो पूर्व मुख्यमंत्रियों और बड़ी संख्या में अन्य लोगों को हिरासत में लिया गया। याचिकाकर्ताओं ने करीब 7,000 लोगों की हिरासत का दावा किया, जबकि इस संख्या और प्रत्येक मामले की वैधता पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अलग विषय है। प्रदर्शन के दौरान पथराव और पुलिसकर्मियों के घायल होने की घटनाओं का भी उल्लेख किया गया।

अब आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट में इस मामले से जुड़ी याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार, दिल्ली पुलिस और DMRC के जवाब महत्वपूर्ण होंगे। अदालत ने सार्वजनिक परिवहन, इंटरनेट सेवाओं और नागरिकों की आवाजाही सामान्य रखने पर जोर दिया है। साथ ही, अधिकारियों से प्रतिबंधों और हिरासत की कार्रवाई के संबंध में स्पष्टीकरण मांगा गया है। मामले में अवमानना और हिरासत से जुड़े आरोपों पर अंतिम फैसला अदालत की आगे की सुनवाई और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर होगा।

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