आज मां चंद्रघंटा को लगाएं इन चीजों का भोग, हर विघ्न-बाधा शीघ्र होगी दूर, मनोवांछित फलों की होगी प्राप्ति
आज शारदीय नवरात्रि का तीसरा दिन है। यह दिन मां चंद्रघंटा को समर्पित है। देवी मां के तीसरे स्वरूप को इन चीजों का भोग लगाने से भक्तों को सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
आज शारदीय नवरात्रि का तीसरा दिन है। इस दिन मां दुर्गा के तीसरे स्वरूप देवी चंद्रघंटा की पूजा की जाती है। मां चंद्रघंटा की उपासना करने से भक्तों के सभी कष्ट और बाधाएं दूर हो जाती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। आज के दिन माता चंद्रघंटा की पूजा और मंत्रों का जाप करने के साथ ही उन्हें ये भोग भी जरूर अर्पित करें। मान्यता है कि माता रानी को ये भोग अति प्रिय है और उन्हें चढ़ाने से भक्तों को मनोवांछित फलों की प्राप्ति होती है। तो आइए यहां जानते हैं कि नवरात्रि की तीसरे दिन मां चंद्रघंटा को क्या-क्या भोग लगाना चाहिए।
नवरात्रि के तीसरे दिन देवी मां को लगाएं ये भोग
दूध से बनी चीजें- नवरात्रि के तीसरे माता रानी को दूध से बनी चीजें अर्पित करें। मां चंद्रघंटा को खीर या दूध से बनी मिठाई का भोग लगाएं।
बताशा, मिश्री- मिठाई के अलावा आप मां चंद्रघंटा को बताशा या मिश्री भी अर्पित कर सकते हैं।
मखाने की खीर- देवी मां को मखाने की खीर का भोग लगाना भी बेहद शुभ और फलदायी माना जाता है।
शहद- मां चंद्रघंटा को शहद भी चढ़ा सकते हैं। शहद का भोग लगाने से देवी मां प्रसन्न होती हैं और आरोग्य का आशीर्वाद देती हैं।
सफेद रंग की मिठाई- दुर्गा माता के तीसरे स्वरूप मां चंद्रघंटा को सफेद चीजें अति प्रिय है। ऐसे में मां चंद्रघंटा को गाय के दूध से बनी खीर, सफेद रंग की मिठाई या रसमलाई का भोग भी लगा सकते हैं।
नवरात्रि के तीसरे दिन क्या करें
आज पूजा करते समय सफेद, गोल्डन, लाल या पीले रंग के कपड़े।
देवी मां को लाल रंग के फूल चढ़ाएं खासतौर से गुड़हल का फूल। गुड़हल का फूल माता रानी को बेहद प्रिय है।
पूजा करते समय मां दुर्गा को रोली, सिंदूर, अक्षत चढ़ाए और कुमकुम लगाएं।
मां अंबे को पान के पत्ते पर सुपारी, लौंग और इलायची रखकर अर्पित करें। ध्यान रखें कि पान का पत्ता कटा-फटा न हो।
माता रानी को सुहाग की सामग्री ((चूड़ियां, आलता, बिंदी, सिंदूर आदि) चढ़ाएं।
पूजा के दौरान मां चंद्रघंटा इस मंत्र का कम से कम 108 बार जाप करें
पिण्डज प्रवरारूढा चण्डकास्त्रकरयुक्ता। प्रसादं तनु मह्यं चंद्रघंतेति विश्रुता॥
