FCRA बिल से जुड़ी अफवाहों की क्या है हकीकत, अमेरिका में भारतीय राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने विस्तार से समझाया
अमेरिका में भारतीय राजदूत ने बताया कि अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोपीय देशों में पहले से ही ऐसे कानून लागू हैं। ऐसे में भारत कोई अलग कानून नहीं ला रहा है। यह कानून विदेशी फंड के बेहतर मैनेजमेंट के लिए है।
भारत सरकार संसद में फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल लाने की तैयारी में है। इस बिल के जरिए विदेश से आने वाले पैसे का बेहतर मैनेजमेंट सुनिश्चित होगा और पारदर्शी तरीके से फंड का इस्तेमाल हो सकेगा। हालांकि, इस बिल को लेकर कई तरह की अफवाहें चल रही हैं। इस वजह से भारत और देश से बाहर रहने वाले लोगों के अंदर इस बिल को लेकर शंका पनप रही है। ईसाई संगठनों ने इसका विरोध भी किया है। ऐसे में अमेरिका में भारत के राजदूत विनय मोहन क्वात्रा ने बिल से जुड़ी अफवाहों की हकीकत बताई है।
अमेरिका में भारत के एम्बेसडर, विनय मोहन क्वात्रा ने एक्स पोस्ट में लिखा, “प्रस्तावित फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल (FCRA), 2026 के बारे में मीडिया और सिविल सोसाइटी में कई गलतफहमियां हैं। यहां मिथक बनाम हकीकत की जांच है।” इसके बाद उन्होंने कई पोस्ट किए, जिनमें इस बिल से जुड़ी अफवाहों की हकीकत बताई गई।
भारत से पहले कई देशों में ऐसा कानून
अफवाह है कि भारत अन्य देशों से अलग जाकर ऐसा कानून ला रहा है, लेकिन सच यह है कि अमेरिका में 1938 से FARA और 2010 से FATCA है। ऑस्ट्रेलिया ने 2018 में कानून बनाया, कनाडा ने 2024 में। यूनाइटेड किंगडम की स्कीम जुलाई 2025 में लागू हुई। यूरोपियन यूनियन अब कानून बना रहा है। दूसरी गलतफहमी यह है कि यह बिल खास तौर पर किसी खास धर्म या समुदाय को टारगेट करता है। असल में यह एक्ट सभी ऑर्गनाइजेशन पर एक जैसा लागू होता है, चाहे उनका धर्म, समुदाय या विचारधारा कुछ भी हो। धार्मिक शिक्षा, पूजा की जगहों का रखरखाव, और हर धर्म के ऑर्गनाइजेशन द्वारा किए जाने वाले चैरिटेबल कामों सहित आस्था पर आधारित वेलफेयर एक्टिविटी, विदेशी फंडिंग के लिए एलिजिबल बनी रहेंगी।
किसी एनजीओ की संपत्ति नहीं होगी जब्त
मिथक है कि यह कानून विदेशी डोनेशन पर निर्भर एनजीओ की संपत्तियों को जब्त करने के लिए है, जिसमें धार्मिक चैरिटी, पूजा की जगहें, हॉस्पिटल, स्कूल और चैरिटेबल ऑर्गनाइजेशन शामिल हैं। सच यह है कि भारत असली इंटरनेशनल पार्टनरशिप का स्वागत करता है और हमेशा एक लीगल फ्रेमवर्क देता रहा है, जिसके तहत ऐसे कंट्रीब्यूशन लिए जा सकते हैं और उनका इस्तेमाल किया जा सकता है। जब कोई रजिस्ट्रेशन कैंसिल या सरेंडर किया जाता है, तो विदेशी कंट्रीब्यूशन और उनसे बने एसेट्स पहले से ही राज्य सरकार की अथॉरिटी में चले जाते हैं। यह 2010 से लागू है। यह नया नहीं है। 2026 का बिल उन संपत्तियों को सुरक्षित रखने के लिए एक तय अथॉरिटी और तरीका देता है। अगर ऑर्गनाइजेशन अपना रजिस्ट्रेशन फिर से शुरू करता है, तो सभी एसेट्स और इस्तेमाल न किए गए फंड पूरे वापस कर दिए जाते हैं। पूजा की जगहों की अपनी सुरक्षा होती है। जहां किसी कैंसिल किए गए एसोसिएशन ने पूजा की जगह से जुड़ी प्रॉपर्टी बनाई है, वहां पूजा जारी रखने के लिए वह प्रॉपर्टी उसी धर्म की दूसरी FCRA-रजिस्टर्ड एसोसिएशन को दे दी जाती है।
एनजीओ के काम पर नहीं होगा कोई असर
गलतफहमी यह भी है कि इस बिल से एनजीओ और चैरिटेबल ऑर्गनाइजेशन के काम पर बुरा असर हुआई है। नया अमेंडमेंट भारत में उनके काम करने की क्षमता को और कम कर देगा। हालांकि, सच यह है कि भारत में आने वाला विदेशी पैसा बढ़ रहा है, नीचे नहीं गिर रहा है। रजिस्टर्ड ऑर्गनाइजेशन को 2010-11 में लगभग 1.2 बिलियन डॉलर विदेशी फंड मिला था। यह बढ़कर 2024-25 में 2.67 बिलियन डॉलर हो गया। भारत में 3 मिलियन से ज्यादा एनजीओ हैं। इनमें से बहुत कम, सिर्फ 14,450 के पास FCRA रजिस्ट्रेशन है। इस तरह, ज्यादातर सिविल सोसाइटी ऑर्गनाइजेशन पूरी तरह से इस एक्ट से बाहर हैं। FCRA किसी को भी विदेशी चैरिटी, रिसर्च ग्रांट या मानवीय मदद लेने से नहीं रोकता है। यह तीन चीजें मांगता है- रजिस्टर करें, तय प्रोसेस से पैसा लें, और रिपोर्ट करें कि आपने उसका क्या किया।
विदेशी मदद को नहीं रोकता FCRA
एक गलतफहमी यह भी है कि भारत सिविल सोसाइटी को विदेशी मदद रोकने के लिए नया कानून बना रहा है। हकीकत इसके उलट है। पब्लिक और पॉलिटिकल जगहों पर विदेशी फाइनेंशियल फ्लो का रेगुलेशन नेशनल सिक्योरिटी की चिंताओं से प्रेरित एक सॉवरेन कदम है। यह दुनिया भर की कई डेमोक्रेसी में मॉडर्न गवर्नेंस का एक माना हुआ फीचर है। भारत में पहला FCRA 1976 में आया था। इसे 2010 में ज्यादा मॉडर्न फ्रेमवर्क से बदल दिया गया और 2016, 2018 में बदलावों से इसे मजबूत किया गया। 2020-2026 का बिल और नियम उसी दिशा में अगला कदम हैं। ज्यादा ट्रांसपेरेंसी, बेहतर गवर्नेंस, साफ नियम। सच तो यह है कि कानून भारतीयों को विदेशी डोनेशन लेने से नहीं रोकता है या कानून मानने वाली सिविल सोसाइटी को बंद नहीं करता है। हजारों एसोसिएशन FCRA के तहत रजिस्टर्ड हैं और हेल्थ, एजुकेशन, डिजास्टर रिलीफ, रिसर्च और ह्यूमनिटेरियन कामों के लिए रेगुलर विदेशी फंड लेते हैं।”
