थ्रिलर के नाम पर सिर्फ स्पीड, अरशद वारसी की एक्टिंग भी नहीं बचा पाई ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ की ढीली स्क्रिप्ट
आज राजकुमार हिरानी के बेटे की डेब्यू वेब सीरीज प्रीतम और पेड्रो रिलीज कर दी गई है। सीरीज में अरशद वारसी भी लीड रोल में हैं। विक्रांत मैसी ने इस सीरीज में अहम रोल निभाया है। पूरी सीरीज कैसी है, जानने के लिए नीचे स्क्रोल करें।
आजकल डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर थ्रिलर वेब सीरीज की बाढ़ सी आई हुई है। सस्पेंस, मर्डर मिस्ट्री और साइबर क्राइम जैसे विषयों पर आए दिन नई कहानियां दर्शकों के सामने परोसी जा रही हैं। इसी कड़ी में जियो सिनेमा पर एक नई छह कड़ियों की शॉर्ट सीरीज ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ रिलीज हुई है। जब किसी प्रोजेक्ट के साथ मशहूर निर्देशक राजकुमार हिरानी का नाम सह-निर्माता के रूप में जुड़ता है तो दर्शकों की उम्मीदें स्वाभाविक रूप से आसमान छूने लगती हैं। ऊपर से इस सीरीज के जरिए उनके बेटे वीर हिरानी अभिनय की दुनिया में कदम रख रहे हैं, लेकिन क्या यह सीरीज सिर्फ एक स्टार किड के लॉन्च पैड से आगे बढ़कर कुछ ठोस दे पाती है? क्या यह दर्शकों को अंत तक बांधे रखने में सफल होती है? जवाब थोड़ा पेचीदा है। यह एक ऐसी सीरीज है जो अपनी कमियों को छिपाने के लिए रफ्तार और हल्के-फुल्के अंदाज का सहारा तो लेती है, लेकिन कमजोर लेखन के कारण एक बेहतरीन मौका हाथ से गंवा देती है।
प्लॉट और स्टोरीलाइन
‘प्रीतम एंड पेड्रो’ की कहानी गोवा की पृष्ठभूमि पर आधारित है। यह कहानी दो बिल्कुल विपरीत मिजाज के किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक अजीब परिस्थिति में साथ आते हैं। कहानी का एक सिरा पेड्रो (अरशद वारसी) से जुड़ा है, जो एक पुराना और जमीनी स्तर पर काम करने वाला पुलिस अधिकारी है। पेड्रो को एक सजा के तौर पर साइबर क्राइम सेल में ट्रांसफर कर दिया गया है, जबकि उसका दिल आज भी क्राइम ब्रांच के लिए धड़कता है। पेड्रो अपनी जिंदगी में एक गहरे व्यक्तिगत दुख से भी गुजर रहा है, उसने अपने छोटे बेटे को खो दिया है, जिसके गम की वजह से उसकी पत्नी (मोना सिंह) के साथ उसके रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हो चुके हैं। इसी बीच एक रसूखदार मंत्री का बेटा रहस्यमय तरीके से गायब हो जाता है, जो एक खतरनाक ऑनलाइन गेम का आदी था। पेड्रो को लगता है कि अगर वह इस हाई-प्रोफाइल मामले को सुलझा लेता है तो उसे वापस अपनी पुरानी और पसंदीदा डिपार्टमेंट में जाने का मौका मिल जाएगा।
कहानी का दूसरा सिरा प्रीतम (वीर हिरानी) से जुड़ता है। प्रीतम एक बेहद प्रतिभाशाली युवा है, जो तकनीक और हैकिंग का उस्ताद है, लेकिन वह पुलिस के चक्कर काट रहा है और इसके पीछ एक एक बहुत ही अजीब और भावनात्मक वजह है, वह अपने दिवंगत दादाजी का चोरी हुआ पुराना टेप रिकॉर्डर ढूंढना चाहता है, जिसमें उसकी दादी की आवाज की एक आखिरी रिकॉर्डिंग है। जब प्रीतम एक बड़े एटीएम डकैती के मामले को चुटकियों में सुलझाने में पेड्रो की मदद करता है तो दोनों के बीच एक सौदा होता है। पेड्रो वादा करता है कि वह पुलिस के संसाधनों का इस्तेमाल कर प्रीतम का टेप रिकॉर्डर ढूंढेगा और बदले में प्रीतम उस मंत्री के बेटे की गुमशुदगी के केस में उसकी मदद करेगा।
शुरुआत में यह लेन-देन का रिश्ता धीरे-धीरे एक गहरी साझेदारी में बदल जाता है। जैसे-जैसे वे इस अपहरण की गुत्थी को सुलझाने के लिए गहराई में उतरते हैं, उनके सामने साइबर अपराध का एक बहुत बड़ा और खतरनाक नेटवर्क खुलकर सामने आता है। इस पूरे जाल के केंद्र में मार्टिन (विक्रांत मैसी) नाम का एक शातिर हैकर है, जिसके फैसले कहानी को एक नया मोड़ देते हैं। पूरी सीरीज इंटरनेट के खतरों, गेमिंग की लत और साइबर बुलिंग जैसे गंभीर विषयों को छूने की कोशिश करती है।
अभिनय के मोर्चे पर कुछ राहत, कुछ मायूसी
जब कहानी के पन्ने ढीले हों, तो अभिनेताओं के कंधों पर जिम्मेदारी दोगुनी हो जाती है। ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिलता है, जहां एक्टिंग डिपार्टमेंट काफी हद तक इस डगमगाती कश्ती को संभालने का काम करता है। इस सीरीज की असली जान और सबसे मजबूत कड़ी अरशद वारसी ही हैं। उन्होंने पेड्रो के किरदार में जान फूंकने के लिए अपनी जानी-मानी सहजता और संजीदगी का एक बेहतरीन कॉकटेल तैयार किया है। स्क्रीन पर आते ही वे अपनी एक अलग धमक छोड़ते हैं। एक तरफ जहाँ वे अपने चिर-परिचित मजाकिया अंदाज से माहौल को हल्का करते हैं, वहीं दूसरी तरफ अपने जवान बेटे को खो चुके एक लाचार और गमगीन पिता के दर्द को अपनी आँखों से बयां कर देते हैं। स्क्रिप्ट की तमाम कमजोरियों को पीछे छोड़ते हुए अरशद दर्शकों को लगातार स्क्रीन से जोड़े रखने में पूरी तरह कामयाब रहे हैं।
अपने करियर की पहली ही पारी खेल रहे वीर हिरानी ने इस सीरीज के जरिए एक बेहद आत्मविश्वास से भरा और प्रॉमिसिंग डेब्यू किया है। कैमरे के सामने उनकी बॉडी लैंग्वेज काफी नेचुरल है, और सबसे अच्छी बात यह है कि उन्होंने खुद को चमकाने के लिए कहीं भी ‘ओवर-द-टॉप’ जाने की कोशिश नहीं की। अरशद वारसी जैसे मँझे हुए कलाकार के सामने खड़े होकर उनके साथ कंधे से कंधा मिलाना आसान नहीं होता, लेकिन वीर ने उनके साथ मिलकर कुछ बेहतरीन जुगलबंदी और कॉमिक टाइमिंग पेश की है। दोनों की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री ही इस शो की सबसे बड़ी यूएसपी बनकर उभरती है। हालांकि जब बात बेहद संजीदा या भारी इमोशनल सीन्स की आती है तो वहां वीर का अनुभवहीन होना थोड़ा सा खटकता है। फिर भी एक नई शुरुआत के तौर पर इसे एक बेहद ठोस कदम माना जाएगा।
विक्रांत मैसी को इस सीरीज में बेहद सीमित स्क्रीन टाइम मिला है, लेकिन वे अपनी कला से इस छोटे से मौके को भी भुना ले जाते हैं। मार्टिन के रोल में उन्होंने बिना ज्यादा बोले, सिर्फ अपने हाव-भाव और सस्पेंस भरे अंदाज़ से एक अजीब सा खौफ और रहस्य पैदा किया है, जो कहानी में एक जरूरी थ्रिल जोड़ता है।
इस पूरी कास्ट में अगर किसी के साथ सबसे ज्यादा नाइंसाफी हुई है, तो वह हैं मोना सिंह। उनके जैसे ऊंचे दर्जे की अदाकारा को इस सीरीज में एक बेहद घिसे-पिटे और कमजोर किरदार में समेट दिया गया। शुरुआती एपिसोड्स को देखकर उम्मीद जगती है कि शायद आगे चलकर पेड्रो की निजी जिंदगी और उनकी पत्नी के दर्द को गहराई से दिखाया जाएगा, लेकिन जैसे ही सीरीज अपने मुख्य इन्वेस्टिगेशन मोड में आती है, मोना सिंह के किरदार को पूरी तरह से बैकसीट पर धकेल दिया जाता है। एक बेहतरीन टैलेंट का ऐसा इस्तेमाल वाकई अखरता है।
निर्देशन और तकनीकी पक्ष
इस सीरीज का निर्देशन अविनाश अरुण धवारे ने किया है, जो इससे पहले ‘पाताल लोक सीजन 1’ और ‘थ्री ऑफ अस’ जैसी बेहतरीन और गंभीर कलाकृतियों के लिए जाने जाते हैं। अविनाश के काम में हमेशा एक खास तरह की गहराई होती है, लेकिन ‘प्रीतम एंड पेड्रो’ में उनका वह सिग्नेचर स्टाइल गायब दिखता है। ऐसा लगता है कि राजकुमार हिरानी, अभिजात जोशी और सुयश त्रिवेदी के लेखन के दबाव में निर्देशक खुलकर अपनी कल्पना का इस्तेमाल नहीं कर पाए। तकनीकी रूप से सीरीज की रफ्तार इसकी सबसे बड़ी ताकत है। छह एपिसोड, जो लगभग 30-30 मिनट के हैं, इतनी तेजी से निकलते हैं कि दर्शक को बोर होने का मौका नहीं मिलता। एडिटिंग चुस्त है, जिससे कहानी कहीं भी ठहरती नहीं है। गोवा के लोकेशंस को अच्छी तरह कैमरे में कैद किया गया है, लेकिन जब बात एक हाई-टेक साइबर थ्रिलर की आती है, तो विजुअल्स में वह आधुनिकता या भव्यता नजर नहीं आती जो आजकल की अंतरराष्ट्रीय सीरीज में देखने को मिलती है। बजट की कमी साफ दिखाई देती है, जिससे यह एक भव्य थ्रिलर के बजाय एक छोटा ‘माइक्रो-ड्रामा’ बनकर रह जाता है।
कहां चूक गई सीरीज?
‘प्रीतम एंड पेड्रो’ की सबसे बड़ी कमजोरी इसका बेहद सतही और पुराना पड़ चुका लेखन है। राजकुमार हिरानी और अभिजात जोशी की जोड़ी को भारतीय सिनेमा में भावनाओं और मनोरंजन के घालमेल के लिए जाना जाता है, लेकिन ओटीटी के इस दौर में उनका यह फॉर्मूला थोड़ा पुराना और बचकाना लगता है। सीरीज में हैकिंग और साइबर अपराध को जिस तरह से दिखाया गया है, वह बेहद पुराना है। आज से बीस साल पहले फिल्मों में जैसे दिखाया जाता था कि हैकर बस लैपटॉप खोलता है, तेजी से कुछ कीबोर्ड दबाता है और दुनिया की सबसे सुरक्षित वेबसाइट हैक हो जाती है; ठीक वैसे ही प्रीतम भी पलक झपकते ही हर सुरक्षा तंत्र को तोड़ देता है। यह सब देखकर आज का समझदार दर्शक खुद को ठगा हुआ महसूस करता है। कहानी में जिस ऑनलाइन गेमिंग के खतरे और ‘ब्लू व्हेल चैलेंज’ जैसी चीजों का जिक्र किया गया है, वह मुद्दा एक दशक पुराना हो चुका है। आज इंटरनेट और साइबर दुनिया के खतरे बहुत बदल चुके हैं, लेकिन लेखकों की सोच अभी भी पुरानी डिबेट्स पर ही अटकी हुई है। फिश-आउट-ऑफ-वाटर कॉमेडी बनाने के चक्कर में पुलिस वाले पेड्रो को कंप्यूटर ऑन करने के लिए संघर्ष करते हुए दिखाना बहुत ही अजीब लगता है। ऐसा लगता है कि जैसे केवल साइबर सेल के कंप्यूटरों में ही पासवर्ड होते हैं। कहानी में जब थ्रिल कम होने लगता है तो दर्शकों का ध्यान भटकाने के लिए संजय दत्त और वीरेंद्र सहवाग जैसे बड़े नामों के कैमियो झोंक दिए जाते हैं। ये कैमियो कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय केवल एक पब्लिसिटी स्टंट की तरह लगते हैं। साथ ही क्लाइमेक्स में जो ट्विस्ट आता है, वह इतना सुविधाजनक है कि वह गंभीर लगने के बजाय अनजाने में एक कॉमेडी सीन बन जाता है।
वर्डिक्ट
‘प्रीतम एंड पेड्रो’ कोई बहुत खराब सीरीज नहीं है, लेकिन यह एक बहुत ही औसत दर्जे का प्रयास है। यदि आप वीकेंड पर बिना ज्यादा दिमाग लगाए, कुछ हल्का-फुल्का और तेज रफ्तार से चलने वाला कंटेंट देखना चाहते हैं तो अरशद वारसी के बेहतरीन अभिनय और वीर हिरानी की सहजता के लिए इसे एक बार देखा जा सकता है। लेकिन अगर आप ‘पाताल लोक’ या ‘असुर’ जैसे किसी ठोस, बुद्धिमान और रोंगटे खड़े कर देने वाले साइबर-थ्रिलर की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह सीरीज आपको बुरी तरह निराश करेगी। यह सीरीज शुरू होने के कुछ ही देर बाद आपके दिमाग से उतर जाती है।
